भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ१३

[विद्यायाः परापरभेद-मीमांसा] <br><br> पूर्वस्य गमेः प्रायशः प्राप्त्यर्थत्वात् । न च परप्राप्तेरवगमार्थस्य भेदोऽस्ति। अविद्याया अपाय एव हि परप्राप्तिर्नार्थान्तरम् । <br><br> ननु ऋग्वेदादिवाह्या तर्हि सा कथं परा विद्या स्यान्मोक्षसाधनं च। <br><br> "या वेदवाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । <br> सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः" (मनु० १२।९५) <br><br> इति हि स्मरन्ति । कुदृष्टित्वान्निष्फलत्वादनादेया स्यात्। उपनिषदां च ऋग्वेदादिवाह्यत्वं स्यात् । ऋग्वेदादित्वे तु पृथक्करणमनर्थकम् अथ परेति । <br><br> न; वेद्यविषयविज्ञानस्य विवक्षितत्वात् । उपनिषद्द्वेद्याक्षर-'गम' धातु प्रायः 'प्राप्ति' अर्थमें प्रयुक्त होती है इसके सिवा परमात्माकी प्राप्ति और उसके ज्ञानके अर्थमें कोई भेद भी नहीं है; क्योंकि अविद्याकी निवृत्ति ही परमात्माकी प्राप्ति है, इससे भिन्न कोई अन्य वस्तु नहीं । <br><br> शङ्का— तब तो वह (ब्रह्मविद्या) ऋग्वेदादिसे बाह्य है, अतः वह परा विद्या अथवा मोक्षकी साधनभूत किस प्रकार हो सकती है ? स्मृतियाँ तो कहती हैं कि "जो वेदवाह्य स्मृतियाँ और जो कोई कुदृष्टियाँ (कुविचार) हैं वे परलोकमें निष्फल और नरककी साधन मानी गयी हैं।" अतः कुदृष्टि होनेसे निष्फल होनेके कारण वह ग्राह्य नहीं हो सकती । तथा इससे उपनिषद् भी ऋग्वेदादिसे बाह्य माने जायेंगे और यदि इन्हें ऋग्वेदादिमें ही माना जायगा तो 'अथ परा' आदि वाक्यसे जो परा विद्याको पृथक् बतलाया गया है वह व्यर्थ हो जायगा । <br><br> समाधान— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [ परा विद्यासे ] वेद्यविषयक ज्ञान बतलाना अभीष्ट है ।