नाड़ी परीक्षा एवं नाड़ी विज्ञान (महर्षि कणाद एवं रावण - वैद्यप्रभा हिन्दी व्याख्या सहित)
Nadi Pariksha and Nadi Vijnana with Hindi Commentary
महर्षि कणाद एवं रावण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ नाड़ीपरीक्षा रोगीके दाहिने हाथ के अंगूठे के मूल के नीचे वैद्य अपने दाहिने हाथसे रोगको जाननेके लिये नाड़ीको छुवे ॥५॥ स्थिरचित्तः प्रशांतात्मा मनसा च विशारदः । स्पृशेदंगुलिभिर्नाडीं जानीयाद्दक्षिणे करे ॥६॥॥ स्थिर चित्तवाला प्रसन्न आत्मा और मनसे अच्छा विचार करनेवाला बुद्धिमान् वैद्य तीन अंगुलियों से रोगीके दाहिने हाथ में नाड़ीको जाने ॥६॥ प्रायः स्फुटा भवति वामकरे वधूनां पुंसां च दक्षिणकरे तदियं परीक्षा । ईषद्विना मितकरं विततांगुलीयं बाहुं प्रसार्य रहितं परिपीडनेन ॥७॥ प्रायः करके स्त्रियोंके बायें हाथमें और पुरुषोंके दाहिने हाथ में नाड़ी स्फुट होती है यह परीक्षा है कछुक नवे ( झुके ) हुए हाथसे संयुक्त और फैली हुई अंगुलियोंवाला परिपीडनसे रहित बाहुको प्रसारित करके ॥७॥ ईषद्विन्नम्रकृतकूर्परवामभागहस्ते प्रसारितसदंगुलिसंधिकेच । अङ्गुष्ठमूलपरिपश्चिमभागमध्ये नाडीं प्रभातसमये प्रथमं परीक्षेत ८ कछुक नई कुहनीके वाम भागवाले और फैली हुई अंगुलियोंकी संधियोंवाले और अंगूठेके मूलसे पश्चिम भागवाले हाथमें प्रभात- समय नाड़ीकी प्रथम परीक्षा करे ॥८॥ वारत्रयं परीक्षेत धृत्वा धृत्वा विमुञ्चयेत् । विमृश्य बहुधा बुद्ध्या रोगव्यक्तिं विनिर्दिशेत ॥९॥ तीन तीन वार परीक्षा करे और पकड़ पकड़कर नाड़ीको छोड़ता जाय और बुद्धिसे बहुत प्रकारसे विचारकर रोगकी प्रगटताको कहे॥९॥