भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त नारदपुराण *

होती है। इस (परमक्रान्तिज्या)-से ग्रहकी ज्या (भुजज्या) को गुणा करके त्रिज्याके द्वारा भाग देनेसे 'इष्टक्रान्ति-ज्या' होती है। उसका चाप बनानेसे 'इष्टक्रान्ति' (मध्यमा) कहलाती है॥ ९३ १/२॥ ग्रहं संशोध्य मन्दोच्चात् तथा शीघ्राद्विशोध्य च॥ ९४॥ शेषं केन्द्रपदं तस्माद्भुजज्या कोटिरेव च। गताद्भुजज्याविषमे गम्यात् कोटिः पदे भवेत् ॥ ९५॥ युग्मे तु गम्याद्वाहुज्या कोटिज्या तु गताद् भवेत्। लिप्तास्तत्त्वयमैर्भक्ता लब्धं ज्यापिण्डकं गतम् ॥ ९६॥ गतगम्यान्तराभ्यस्तं विभजेत्तत्त्वलोचनैः। तदवाप्तफलं योज्यं ज्यापिण्डे गतसंज्ञके ॥ ९७॥ स्यात्क्रमज्या विधिरयमुत्क्रमज्यास्वपि स्मृतः। ज्यां प्रोह्य शेषं तत्त्वाश्विहतं तद्विरोद्धृतम् ॥ ९८॥ संख्यातत्तवाश्विसंवर्गे संयोज्य धनुरुच्यते।

( 'भुजज्या' और 'कोटिज्या' बनानेकी रीति - ) ग्रहोंको अपने-अपने मन्दोच्चमें घटानेसे शेष उस ग्रहका 'मन्द केन्द्र' तथा शीघ्रोच्चमें घटानेसे शेष उस ग्रहका 'शीघ्र केन्द्र' कहलाता है। उस राश्यादि केन्द्रकी 'भुजज्या' और 'कोटिज्या' बनानी चाहिये। विषम (१, ३) पदमें 'गत' चापकी जीवा भुजज्या और 'गम्य' चापकी जीवा कोटिज्या कहलाती है^१। सम (२, ४) पदमें 'गम्य' चापकी जीवा 'भुजज्या' और 'गत' चापकी जीवा 'कोटिज्या' होती है^२॥ ९४-९५ १/२॥

( इष्टज्या-साधन-विधि )—जितने राश्यादि चापकी जीवा बनाना हो, उसकी कला बनाकर उसमें २२५ से भाग देकर जो लब्धि हो, उतनी संख्या (सिद्ध २४ ज्या-पिण्डमें) गत ज्यापिण्डकी संख्या समझे। शेष कलाको 'गत ज्या' और 'गम्य ज्या' के अन्तरसे गुणा करके २२५ से भाग देकर लब्ध कलादिको 'गत ज्या'-पिण्डमें जोड़नेसे 'अभीष्ट ज्या' होती है। 'उत्क्रमज्या' भी इसी विधिसे बनायी जाती है^३॥ ९६-९७ १/२॥

( जीवासे चाप बनानेकी विधि )—इष्ट जीवाकी कलामें सिद्ध जीवापिण्डोंमेंसे जितनी संख्यावाली जीवा घटे, उसको घटाना चाहिये। शेष कलाको


भाग देकर लब्धि २ को प्रथम खण्ड २२४ में घटानेसे शेष २२२ द्वितीय खण्ड हुआ; इसको द्वितीय जीवामें जोड़नेसे ६७१ तृतीय जीवा हुई। फिर तृतीय जीवामें प्रथमज्यासे भाग देकर लब्धि ३ को द्वितीय खण्डमें घटानेसे शेष २१९ तृतीय खण्ड हुआ। इसको तृतीय जीवा ६७१ में जोड़नेसे ८९० यह चतुर्थ जीवा हुई। इसी प्रकार आगे भी साधन करनेपर निम्नाङ्कित सिद्ध २४ ज्यार्धकी कलाएँ होती हैं—२२५, ४४९, ६७१, ८९०, ११०५, १३१५, १५२०, १७१९, १९१०, २०९३, २२६७, २४३१, २५८५, २७२८, २८५९, २९७८, ३०८४, ३१७७, ३२५६, ३३२१, ३३७२, ३४०९, ३४३१ तथा ३४३८। ये १ पदमें (३ राशिमें) २४ ज्यार्ध-पिण्ड हैं।

१. ३ राशि (९० अंश)-का १ पद होता है। उस पदमें 'गत' चापको घटानेसे शेष 'गम्य' चाप कहलाता है। जैसे सूर्यराश्यादि ८।१०।१५।२५ है, उसका मन्दोच्च २।१७।३५।४० है तो मन्दोच्चमें सूर्यको घटानेसे राश्यादि शेष ६।७।१७।१५ केन्द्र हुआ। यहाँ केन्द्र ६ राशिसे अधिक है, अतः तृतीय (विषम) पदमें पड़ा। इसलिये तृतीय पदके गतांशादि ७।१७।१५ को ९० अंशमें घटानेसे अंशादि ८२।४२।४५-ये 'गम्य' अंशादि हुए।

२. जैसे स्वल्पान्तरसे सूर्यका मन्दोच्च २।१७।४८।५४ है। इसमें मध्यम सूर्य ७।६।१८।५४ को घटानेसे शेष ७।११।३०।० यह मन्द केन्द्र हुआ। यह ६ राशिसे अधिक होनेके कारण तुलादिमें पड़ा तथा तृतीय पदमें होनेके कारण इसमें ६ राशि घटाकर शेष १।११।३०।० यह भुज हुआ। इसको ९० अंश (३ राशि) में घटानेसे शेष १।१८।३०।० यह कोटि हुई।

भुजज्या बनानेके लिये आगे कही हुई रीतिसे राश्यादि भुज १।११।३० को कला बनानेसे २४९० कला हुई। इसमें २२५ से भाग देनेपर लब्धि गतज्या ११ हुई। शेष २५ को गतज्या, एष्यज्या (११ वीं और १२ वीं ज्या)-के अन्तर (२४३१-२२६७)=१६४ से गुणा करनेपर ४१०० हुआ। इसमें २२५ का भाग देनेपर लब्धि १८ कलाको गतज्या २२६७ में जोड़नेसे सूर्यकी भुजज्या २२८५ हुई। इसी प्रकार कोटिकी कलाद्वारा कोटिज्या २६७५ हुई।

३. जैसे परम क्रान्ति २४ अंशकी कला १४४० में २२५ का भाग देनेसे लब्धि ६ 'गतज्या'-संख्या हुई, जिसका प्रमाण १३१५ है। शेष कला ९० को 'गतज्या' 'एष्यज्या'के अन्तर (१५२०-१३१५=२०५)-से गुणा कर उसमें २२५ से भाग देनेपर लब्धि ८२ को गतज्या १३१५ में जोड़नेसे १३९७ यह परम क्रान्ति (२४ अंश)-की ज्या हुई।