भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 285
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २८३ ---|--- २२५ से गुणा करके गुणनफलमें गत, गम्य जीवाके अन्तरसे भाग देकर जो लब्धि कलादि हो, उसको घटायी हुई सिद्ध-जीवा-संख्यासे गुणित २२५ में जोड़नेसे इष्टज्याका चाप होता हैं॥ ९८ १/२ ॥<br><br>रवेर्मन्दपरिध्यंशा मनवः शीतगो रदाः॥ ९९ ॥<br>युग्मान्ते विषमान्ते तु नखलिस्रोनितास्तयोः।<br>युग्मान्तेऽर्थाद्रयः खाग्निसुराः सूर्या नवार्णवाः ॥ १००॥<br>ओजे द्व्यगा वसुयमा रदा रुद्रा गजाब्धयः।<br>कुजादीनामतः शैघ्या युग्मान्तेऽर्थाग्रिदस्रकाः ॥ १०१ ॥<br>गुणाग्निश्चन्द्रा खनगा द्विस्राक्षीणि गोऽग्नयः।<br>ओजान्ते द्वित्रियमला द्विविश्वे यमपर्वताः ॥ १०२ ॥<br>खर्तुदस्रा वियद्वेदाः शीघ्रकर्मणि कीर्तिताः।<br>ओजयुग्मान्तरगुणा भुजज्या त्रिज्ययोद्धृता ॥ १०३ ॥<br>युग्मवृत्ते धनर्णं स्यादोजादूनाधिके स्फुटम्।<br><br>( रवि और चन्द्रमाके मन्दपरिध्यंश )—समपदके अन्तमें सूर्यके १४ अंश और चन्द्रमाके ३२ अंश मन्दपरिधि मान होते हैं और विषमपदके अन्तमें २० कला कम अर्थात् सूर्यके १३।४० और चन्द्रमाके ३१।४० मन्दपरिध्यंश हैं ॥ ९९ १/२ ॥<br><br>( मङ्गलादि ग्रहोंकी मन्द और शीघ्र परिधि )—समपदान्तमें मङ्गलके ७५, बुधके ३०, गुरुके ३३, शुक्रके १२ और शनिके ४९ तथा विषमपदान्तमें मङ्गलके ७२, बुधके २८, गुरुके ३२, शुक्रके ११ और शनिके ४८ मन्द परिध्यंश हैं। इसी प्रकार समपदके अन्तमें मङ्गलके २३५, बुधके १३३, गुरुके ७०, शुक्रके २६२ और शनिके ३९ तथा विषमपदान्तमें मङ्गलके २३२, बुधके १३२, गुरुके ७२, शुक्रके २६० और शनिके ४० शीघ्र परिध्यंश कहे गये हैं॥ १००-१०२ १/२ ॥ | ( अभीष्ट स्थानमें परिधिसाधन— ) अभीष्ट स्थानमें मन्द या शीघ्र परिधि बनानी हो तो उस ग्रहकी भुजज्याको विषम-समपदान्त-परिधिके अन्तरसे गुणा करके गुणनफलमें त्रिज्या (३४३८)- से भाग देकर जो अंशादि लब्धि हो, उसको समपदान्त-परिधिमें जोड़ने या घटानेसे (विषमपदान्तसे समपदान्त कम हो तो जोड़ने अन्यथा घटानेसे) इष्टस्थानमें स्पष्ट मन्द या शीघ्र परिध्यंश होते हैं॥ १०३ १/२ ॥<br><br>तद्गुणे भुजकोटिज्ये भगणांशविभाजिते ॥१०४॥<br>तद्धुजज्याफलधनुर्मान्दं लिप्तादिकं फलम्।<br>शैघ्यं कोटिफलं केन्द्रे मकरादौ धनं स्मृतम्॥१०५ ॥<br>संशोध्यं तु त्रितीवायां कर्यादौ कोटिजं फलम्।<br>तद्वाहुफलवर्गैक्यान्मूलं कर्णश्चलाभिधः ॥१०६ ॥<br>त्रिज्याभ्यस्तं भुजफलं चलकर्णविभाजितम्।<br>लब्धस्य चापं लिप्तादिफलं शैघ्यमिदं स्मृतम् ॥१०७ ॥<br>एतदाद्ये कुजादीनां चतुर्थे चैव कर्मणि।<br>मान्दं कर्मैकमर्केन्द्वोर्भौमादीनामथोच्यते ॥१०८ ॥<br>शैघ्यं मान्दं पुनर्मान्दं शैघ्यं चत्वार्यनुक्रमात्।<br><br>( भुजफल-कोटिफल-साधन— ) इस प्रकार साधित स्पष्ट परिधिसे ग्रहकी ‘भुजज्या’ और ‘कोटिज्या’ को पृथक्-पृथक् गुणा करके भगणांश (३६०)-से भाग देकर लब्ध (भुजज्यासे) भुजफल और (कोटिज्यासे) कोटिफल होते हैं। एवं मन्द परिधिद्वारा मन्दफल और शीघ्र परिधिद्वारा शीघ्र-फल समझने चाहिये। यहाँ मन्द परिधिवश भुजज्याद्वारा जो भुजफल आवे, उसका चाप बनानेसे मन्द कलादि फल होता है॥ १०४ १/२ ॥<br><br>( शीघ्र कर्णसाधन— ) पूर्वविधिसे शीघ्र

१. जैसे परमक्रान्तिज्याका चाप बनाना है, तो परमक्रान्तिज्या १३९७ में कथित छठी जीवा १३१५ को घटाकर शेष ८२ को २२५ से गुणाकर गत, गम्य ज्याके अन्तर २०५ से भाग देनेपर लब्धि ९० को ६×२२५=१३५० में जोड़नेसे १४४० हुआ। इसको अंश बनानेसे २४ परम क्रान्ति-अंश हुए। २. जैसे—सूर्यकी भुजज्या २२७८ को विषम-सम परिधिके अन्तर २० से गुणा करनेपर ४५५६० हुआ। इसमें ३४३८ का भाग देनेसे लब्धि १३ कलाको समपदान्त परिधि-अंश १४ में घटानेसे १३ । ४७ सूर्यकी स्पष्ट मन्द परिधि हुई। ३. जैसे—सूर्यकी भुजज्या २२७८ को स्पष्ट मन्द परिधि १३ । ४७ से गुणा कर ३१३९८ । २६ हुआ। इसमें ३३० का भाग देनेसे लब्धि कलादि ८७ । १३ यह भुजफल हुआ। यह २२५ से कम है, अतः इसका चाप भी इतना ही हुआ और यही सूर्यका कलादि मन्दफल हुआ। इसके अंशादि बनानेसे १ । २७ । १३ हुआ, इसको तुलादि केन्द्र होनेके कारण मध्यम सूर्य ७ । ६ । १८ ।