भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 287
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २८५

शीघ्रोच्च गतिमें घटाकर शेषको त्रिज्या तथा अन्तिम शीघ्रकर्णके अन्तरसे गुणा करके पूर्वसाधित शीघ्रकर्णके द्वारा भाग देनेसे जो लब्धि (कलादि) हो, उसको यदि कर्ण त्रिज्यासे अधिक हो तो मन्दस्पष्ट गतिमें धन करने (जोड़ने) और अल्प हो तो घटानेसे स्पष्ट गति होती है। यदि साधित ऋणगतिफल मन्दस्पष्ट गतिसे अधिक हो तो उसी (ऋणगतिफल)-में मन्दस्पष्ट गतिको घटाकर जो बचे, वह वक्रगति होती है। इस स्थितिमें वह ग्रह वक्र-गति रहता है१ ॥ १११-११५ ॥

कृतर्तुचन्द्रैर्वेदेन्द्रैः शून्यत्र्यर्केर्गुणाष्टिभिः । शतरुद्रैश्चतुर्थेषु केन्द्रांशैर्भूसुतादयः ॥ ११६ ॥ वक्रिणश्शुक्रेन्दुदैस्तैरंशैरूञ्जन्ति वक्रताम् । क्रान्तिज्या विषुवद्भाघ्नी क्षितिज्या द्वादशोद्धृता ॥ ११७ ॥ त्रिज्यागुणा दिनव्यासभक्ता चापं चरासव । तत्कार्मुकमुदक्क्रान्तौ धनहीने पृथक् स्थिते ॥ ११८ ॥ स्वाहोरात्रचतुर्भागे दिनरात्रिदले स्मृते । याम्यक्रान्तौ विपर्य्यस्ते द्विगुणे तु दिनक्षपे ॥ ११९ ॥

(ग्रहोंकी वक्र केन्द्रांश-संख्या - ) मङ्गल अपने चतुर्थ शीघ्रकेन्द्रांश १६४ में, बुध १४४ केन्द्रांशमें, गुरु १३० केन्द्रांशमें, शुक्र १६२ केन्द्रांशमें और शनि ११५ शीघ्रकेन्द्रांशमें वक्रगति होता है। अपने-अपने वक्रकेन्द्रांशको ३६० में घटानेसे शेषके तुल्य केन्द्रांश होनेपर फिर वह मार्ग-गति होता है२ ॥ ११६ १/२ ॥

(कालज्ञान - ) रवि-क्रान्तिज्याको पलभा३ से गुणा करके गुणनफलमें १२ से भाग देनेपर लब्धि 'कुज्या' होती है। उस (कुज्या)-को त्रिज्यासे गुणा करके द्युज्या (क्रान्तिकी कोटिज्या) से भाग देकर लब्धि (चरज्या)-के चाप बनानेसे चरासु४ होते हैं। उस चर-चापको यदि उत्तर क्रान्ति हो तो १५ घटीमें जोड़नेसे दिनार्ध और १५ घटीमें घटानेसे रात्र्यर्ध होता है। दक्षिणक्रान्ति हो तो विपरीत (यानी १५ घटीमें घटानेसे दिनार्ध और जोड़नेसे रात्र्यर्ध) होता है। दिनार्धको दूना करनेसे दिनमान और रात्र्यर्धको दूना करनेसे रात्रिमान होता है५ ॥ ११७-११९ ॥

भभोगोऽष्टशतीलिप्ताः खाश्विशैलास्तथा तिथेः ।


है तथा रवि और चन्द्रमाकी मन्दस्पष्ट गति ही स्पष्ट गति होती है। मङ्गलादि ग्रहोंके शीघ्रोच्चवश शीघ्र गतिफलका पुनः संस्कार करनेसे स्पष्ट गति होती है।

१. जैसे सूर्यको गति ५९।८ को गत-एष्यज्याके अन्तर १६४ से (जो भुजज्यासाधनमें गतैष्यज्यान्तर हुआ था) गुणा करनेपर ९३९७।५२ हुआ। इसमें २२५ से भाग देनेपर लब्धिकला ४३ को मन्दपरिधि १३।४७ से गुणा करके गुणनफल ५९२।४१ में ३६० से भाग देनेपर लब्धिकलादि गतिफल १।३९ हुआ। इसको कर्कादि केन्द्र होनेके कारण सूर्यकी मध्यगति ५९।८ में जोड़नेसे ६०।४७ यह मन्दस्पष्ट गति हुई; यही सूर्यकी स्पष्ट गति भी होती है।

२. जैसे मङ्गलके वक्रकेन्द्रांश १६४ को ३६० में घटानेसे शेष १९६ मार्ग-केन्द्रांश हुए। इससे सिद्ध हुआ कि जब मङ्गलका शीघ्रकेन्द्रांश १६४ से १९६ तक रहता है, तबतक मङ्गल वक्र रहता है। इसी प्रकार सब ग्रहोंके मार्गकेन्द्रांश समझने चाहिये।

३. ३० घड़ीका दिन हो तो उस दिनके दोपहरमें बारह अङ्गुल शङ्कुकी छायाका नाम 'पलभा' है।

४. दीर्घ अक्षरके दस बार उच्चारणमें जितना समय लगता है, उतना काल १ असु (प्राण) कहलाता है। ६ असुका १ पल और ६० पलकी १ घड़ी होती है। अतः चरासुमें ६ के भाग देकर, पल बनाकर दिनमान साधन करना चाहिये।

५. क्रान्ति बनानेमें अयनांश जोड़ना होता है, इसलिये १३२ वें श्लोकके अनुसार अयनांश-साधन किया जाता है। अहर्गण १८४६२३७ को ६०० से गुणा कर गुणनफल ११०७७४२२०० में युग-कुदिन १५७७९१७८२८ से भाग देनेपर लब्धि राश्यादि ८।१२।४४ हुई। इसके भुज २।१२।४४ के अंशादि ७२।४४को ३ से गुणा कर गुणनफल २१८।१२ में १० से भाग देनेपर लब्धि अंशादि २१।४९।१२ यह अयनांश हुआ। इस अयनांशको स्पष्टसूर्य ७।४।५१।१२ में जोड़नेसे सायन सूर्य ७।२६।४०।२४ हुआ, इसका भुज १।२६।४०।२४ है और इस भुजकी ज्या २८७२ हुई। इस भुजज्याको परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल ४०१२१८४ में त्रिज्या ३४३८ से भाग देनेपर लब्धि ११६७ क्रान्तिज्या हुई। इसकी चापकला ११९१ के अंश १९।५१ क्रान्त्यंश हुए। इनको ९० अंशमें घटानेसे शेष ७०।९