संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें२८६ * संक्षिप्त नारदपुराण *
| ग्रहलिप्ता भभोगाप्ता भानि भुक्त्वा दिनादिकम् ॥ १२० ॥<br>रवीन्दूयोगलिप्ताभ्यो योगा भभोगभाजिताः।<br>गतगम्याश्च षष्टिघ्नो भुक्तियोगाप्तनाडिकाः ॥ १२१ ॥<br>अर्कोनचन्द्रलिप्ताभ्यस्तिथयो भोगभाजिताः।<br>गता गम्याश्च षष्टिघ्नो नाड्यो भुक्त्यन्तरोद्धृताः ॥ १२२ ॥<br><br>(पञ्चाङ्ग-साधन—) ८०० कला एक-एक नक्षत्रका और ७२० कला एक-एक तिथिका भोगमान होता है। (अतः ग्रह किस नक्षत्रमें है, यह जानना हो तो) राश्यादि ग्रहको कलात्मक बनाकर उसमें भभोग (८००) के द्वारा भाग देनेसे जो लब्धि हो, उसके अनुसार अश्विनी आदि गत नक्षत्र समझने चाहिये। शेष कलादिसे ग्रहकी गतिके द्वारा उसकी गत और गम्यघटीको समझना चाहिये¹ ॥ १२० ॥<br><br>उदयकालिक स्पष्टरवि और चन्द्रका योग करके उसकी कलामें भभोग (८००)-के द्वारा | भाग देकर लब्धि-गत विष्कम्भ आदि योग होते हैं। शेष वर्तमान योगकी गतकला है। उसको ८०० में घटा देनेसे गम्यकला होती है। उस गत और गम्यकलाको ६० से गुणा करके उससे रवि और चन्द्रकी गति-कलाके योगसे भाग देनेपर गत और गम्यघटी होती है² ॥ १२१ ॥<br><br>स्पष्टचन्द्रमें स्पष्टसूर्यको घटाकर शेष राश्यादिकी कला बनाकर उसमें तिथिभोग (७२०)-से भाग देनेपर लब्धि गततिथि-संख्या होती है। शेष वर्तमान तिथिकी गतकला है। उसको ७२० में घटानेसे गम्यकला होती है। गत और गम्यकलाको पृथक् ६० से गुणाकर चन्द्र और रविके स्पष्ट गत्यन्तरसे भाग देकर लब्धि-क्रमसे भुक्त (गत) और गम्य घटी होती हैं। (पञ्चाङ्गमें वर्तमान तिथिके आगे गम्यघटी लिखी जाती है)³ ॥१२२॥ |
क्रान्तिका कोटिचाप हुआ। इसकी ज्या ३२३३ हुई, इसको द्युज्या कहते हैं।
गोरखपुरकी पलभा ६ के वर्ग ३६ को १२ के वर्ग १४४ में जोड़नेसे १८० हुआ। इसका मूल स्वल्पान्तरसे १३+३/९ पलकर्ण हुआ। क्रान्तिज्या ११६७ को पलभा ६ से गुणा कर गुणनफल ७००२ में १२ से भाग देनेपर लब्धि स्वल्पान्तरसे ५८३ कुज्या हुई। इसको त्रिज्या ३४३८ से गुणा कर गुणनफल २००४३५४ में द्युज्या ३२३३ से भाग देनेपर लब्धि ६२० चरज्या हुई। इसका चाप ६२६ यह चरासु हुआ, इसमें ६ से भाग देनेपर लब्ध चरपल १०४ हुए; इनकी घड़ी १।४४ हुई। इसको सायनसूर्यके दक्षिणगोलमें रहनेके कारण १५ घड़ीमें घटानेसे १३।१६ यह दिनार्ध और चरको १५ घड़ीमें जोड़नेसे रात्र्यर्ध १६।४४ हुआ। दिनार्धको दूना करनेसे घट्यादि २६।३२ दिनमान हुआ तथा रात्र्यर्धको दूना करनेसे ३३।२८ रात्रिमान हुआ।
१. **उदाहरण—**जैसे स्पष्टचन्द्रमाकी गति ८१९, राश्यादि २।१०।१५।२५ है, तो इसको कलात्मक बनानेसे ४२१५।२५ हुई। कलामें ८०० के द्वारा भाग देनेसे लब्धि ५ हुई। यह गत नक्षत्र अश्विनीसे ५ वें मृगशिराका सूचक है। शेष २१५।२५ यह वर्तमान आर्द्रा नक्षत्रकी गतकला हुई। इसको भभोग (८००)-में घटानेसे शेष ५८४।३५ यह आर्द्राकी गम्यकला हुई। इस प्रकार उदयकालिक चन्द्रकलासे नक्षत्रकी गम्यकलाद्वारा त्रैराशिकसे नक्षत्रकी गम्यघटी साधनकर पञ्चाङ्गमें लिखी जाती है। त्रैराशिक इस प्रकार है—यदि चन्द्रगतिकलामें ६० घड़ी तो गत, गम्यकलामें क्या? इसका उत्तर आगे श्लोक १२२ की टिप्पणीमें देखिये, तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण—इन ५ को पञ्चाङ्ग कहते हैं। स्पष्टचन्द्रमासे उक्त रीतिद्वारा साधित नक्षत्र ही पञ्चाङ्गोपयोगी नक्षत्र होता है। अर्थात् वही नक्षत्र पञ्चाङ्गमें लिखा जाता है।
२. **योग-साधन—**स्पष्टसूर्य और चन्द्रमाके योग ७।२९।५७।४० की कला १४३९७।४० में ८०० से भाग देनेपर लब्धि १७ गत योग व्यतीपात हुआ; शेष ७९७।४० यह वर्तमान वरीयान् योगका भुक्त हुआ; इसको ८०० कलामें घटानेसे शेष २।२० वरीयान्का भोग्य हुआ। उपर्युक्त विधिसे भुक्त ७९७।४० और भोग्य २।२० कलाको पृथक्-पृथक् ६० घड़ीसे गुणा कर गुणनफलमें सूर्य और चन्द्रमाकी गतिके योग ८७६।३६ से भाग देनेपर लब्धि क्रमशः भुक्त घड़ी-पल ५४।३५ और भोग्य घड़ी-पल ०।९ हुई।
३. जैसे आर्द्रा नक्षत्रकी गम्यकला ५८४।३५ है तो उसको ६० से गुणा करनेसे गुणनफल ३५०७५ में चन्द्रगतिकला ८१९ से भाग देनेपर लब्धि घट्यादि ४२।४९ यह आर्द्राका गम्य (उदयसे आगेका) मान हुआ।
**तिथि-साधन—**यदि उदयकालमें चन्द्रमा ६।२४।१५।३, सूर्य १।५।४२।३७, चन्द्रगति ८१९।०, सूर्य-गति