भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 619
  • उत्तरभाग * ६१७

पूर्वकालमें राजा शिविने कबूतरकी प्राणरक्षाके लिये भूखे बाजको अपना मांस दे दिया था। वरानने ! प्राचीन कालमें इस पृथ्वीपर जीमूतवाहन नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जिन्होंने एक सर्पकी प्राणरक्षाके लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया था। इसलिये देवि! राजाको सदा दयालु होना चाहिये। शुभे! बादल पवित्र और अपवित्र स्थानमें भी समानरूपसे वर्षा करता है। चन्द्रमा अपनी शीतल किरणोंसे चाण्डालों और पतितोंको भी आह्लाद प्रदान करते हैं। अतः सुन्दरि! इस दुःखिया छिपकलीको मैं उसी प्रकार अपने पुण्य देकर उद्धार करूँगा, जैसे राजा ययातिका उद्धार उनके नातियोंने किया था।

इस प्रकार मोहिनीकी बातका खण्डन करके राजाने छिपकलीसे कहा—'मैंने विजयाका पुण्य तुम्हें दे दिया, दे दिया। अब तुम समस्त पापोंसे रहित हो विष्णुलोकको चली जाओ।' भूपाल! राजा रुक्माङ्गदके ऐसा कहनेपर उस स्त्रीने सहसा छिपकलीके उस पुराने शरीरको त्याग दिया और दिव्य शरीर धारण करके दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो वह दसों दिशाओंको प्रकाशित करती हुई राजाकी आज्ञा ले अद्भुत वैष्णव धामको चली गयी। वह वैकुण्ठधाम योगियोंके लिये भी अगम्य है। वहाँ अग्नि आदिका प्रकाश काम नहीं देता। वह स्वयं प्रकाश, श्रेष्ठ, वरणीय तथा परमात्मस्वरूप है; अतः राजन्! यह अग्निको भी प्रकाश देनेवाली विजया-द्वादशी (वामन-द्वादशी) सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाश देनेके लिये प्रकट हुई है।


मोहिनीके साथ राजा रुक्माङ्गदका वैदिश नगरको प्रस्थान, राजकुमार धर्माङ्गदका स्वागतके लिये मार्गमें आगमन तथा पिता-पुत्र-संवाद

वसिष्ठजी कहते हैं—छिपकलीको पापसे मुक्त करके राजा रुक्माङ्गद बड़े प्रसन्न हुए और वे मोहिनीसे हँसते हुए बोले—'घोड़ेपर शीघ्र सवार हो जाओ।' राजाकी बात सुनकर मोहिनी वायुके समान वेगवाले उस अश्वपर पतिके साथ सवार हुई। राजा रुक्माङ्गद बड़े हर्षके साथ मार्गमें आये हुए वृक्ष, पर्वत, नदी, अत्यन्त विचित्र वन, नाना प्रकारके मृग, ग्राम, दुर्ग, देश, शुभ नगर, विचित्र सरोवर तथा परम मनोहर भूभागका दर्शन करते हुए वैदिश नगरमें आये, जो उनके अपने अधीन था। गुप्तचरोंके द्वारा महाराजके आगमनका समाचार सुनकर राजकुमार धर्माङ्गद हर्षमें भर गये और अपने वशवर्ती राजाओंसे पिताके सम्बन्धमें इस प्रकार बोले—'नृपवरो! मेरे पिताका अश्व इधर आ पहुँचा है। इसलिये हम सब लोग महाराजके सम्मुख चलें। जो पुत्र पिताके आनेपर उनकी