भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 304 में से

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पृष्ठ 219

राजा को स्त्री की गर्भोत्पत्ति (पुत्र-प्राप्ति) के पश्चात् भी भाभी से प्रणय- सम्बन्ध बनाये रखने वाले ज्येष्ठ अथवा कनिष्ठ भ्राता को मृत्युदण्ड देना चाहिए, अन्यथा समाज में अराजकता फैल जायेगी, धर्म-मर्यादा विशृंखलित हो जायेगी और मानव-चरित्र कलंकित हो जायेगा। ईर्ष्यासूयसमुत्थे तु सम्बन्धे रागहेतुके। दम्पती विवदीयातां न ज्ञातिषु न राजनि॥ 89 ॥ परिणय सूत्र में बंध जाने के उपरान्त पति-पत्नी को आपसी ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध अथवा राग आदि के कारण अपने जाति बन्धुओं तथा राज पुरुषों के सामने एक दूसरे को अपमानित नहीं करना चाहिए। आशय यह है कि किसी कारणवश दोनों को एक दूसरे के लिए उपयुक्त न समझने पर भी विवाह बन्धन को दैवी विधान समझकर समझौते का मार्ग अपनाना चाहिए। एक दूसरे की न्यूनता के प्रति सहानुभूति का दृष्टिकोण रखना चाहिए। इसी में गृहस्थ-जीवन की सफलता है। अन्योन्यं त्यजतोरागः स्यादन्योन्यविरुद्धयोः । स्त्रीपुंसयोर्निगूढाया व्यभिचारादृते स्त्रियाः ॥ 90 ॥ विवाह के उपरान्त स्त्री-पुरुष के एक-दूसरे से सौमनस्य एवं सौहार्द न बन पाने पर भी, दोनों को एक-दूसरे को सहन करने, दोषों की उपेक्षा करने तथा गुणों को महत्त्व देने का अभ्यास करना चाहिए। यदि स्त्री व्यभिचारिणी अथवा स्वैरिणी नहीं है, तो पुरुष को यत्नपूर्वक उसकी रक्षा करनी चाहिए। किसी साधारण दोष अथवा अपराध अथवा मनमुटाव के कारण पुरुष को स्त्री को छोड़ने का अधिकार नहीं मिल जाता। स्त्री के दुराचारिणी न होने पर, सम्बन्ध-विच्छेद करने पर भी, दोनों को समान रूप से दोषी माना जाता है। समाज दोनो को अपमानित करता है और उन्हें हीन दृष्टि से देखता है। व्यभिचारे स्त्रियां मौण्ड्यमधः शयनमेव च। कदनं वा कुवासश्च कर्म चावस्करोज्झनम् ॥ 91 ॥ व्यभिचारिणी स्त्री के सम्बन्ध बनाये रखने के आग्रह पर उसे सुधरने के अवसर देने की अवधि में उसका सिर मुंडवा देना चाहिए, उसे रात्रि में धरती पर सोना चाहिए। उसे पहनने के लिए गन्दे वस्त्र और खाने के लिए कुत्सित अन्न देना चाहिए। इसके अतिरिक्त उससे मैला साफ़ करने जैसे निकृष्ट कार्य कराने चाहिए। स्त्रीधनभ्रष्टसर्वस्वां गर्भविस्त्रंसिनी तथा। भर्तुश्च वधमिच्छन्तीं स्त्रियं निर्वासयेत् पुरात् ॥ 92 ॥ स्त्रीधन तथा पुरुष की सम्पत्ति को उजाड़ने वाली, गर्भधारण न कर सकने वाली अथवा बार बार ओषधि आदि खाकर जान-बूझकर गर्भपात करने वाली तथा पति की हत्या की योजना (विष आदि देकर) बनाने वाली स्त्री को न केवल नारदस्मृति / 217