भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 304 में से

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पृष्ठ 226

माता के दिवंगत होने पर, उसके स्त्रीधन पर उसकी लड़कियों का और लड़कियों के न होने पर धेवतों-लड़कियों की सन्तान-का अधिकार होता है। टिप्पणी- यहां 'क्रमात्,' अर्थात् क्रमानुसार शब्द एक विशेष प्रयोजन लिये हुए है। स्मृतिकारों ने औरस, क्षेत्रज आदि बारह प्रकार के पुत्र माने हैं, जिसका अर्थ, पैतृक सम्पत्ति पर सर्वप्रथम अधिकार औरस का, उसके पश्चात् क्षेत्रज का और उसके पश्चात् अन्यान्यों का है, अर्थात् यहां क्रमशः चलना है। हां, दिवंगत पुरुष के इन बारह प्रकार के पुत्रों में, किसी एक के भी न होने पर, उसकी सम्पत्ति पर अन्यान्य सपिण्डी, सगोत्री आदि को अधिकार मिलता है, अन्यथा कदापि नहीं। मातुर्निवृत्ते रजसि दत्तासु भगिनीषु च। निवृत्ते वापि रमणे पितुर्युपरतस्पृहे ॥३॥ निम्नोक्त परिस्थितियों में पिता के जीवनकाल में उसकी इच्छा से (किसी दबाव में आकर किया अथवा कराया गया विभाजन अवैध हो जाता है।) पुत्र विभाजन कर सकते हैं- 1 माता की रजोनिवृत्ति हो जाना, अर्थात् अन्य सन्तान के उत्पन्न होने की किसी सम्भावना का समाप्त हो जाना। 2. सभी बहिनों (भाइयों का भी) का विवाहित हो जाना। 3. पिता का अपनी पत्नी के साथ सम्भोग से उपरत हो जाना तथा 4. पिता द्वारा किसी अन्य स्त्री की स्पृहा न करना, अर्थात् पुनर्विवाह करने की अथवा रखैल बनाने की इच्छा का न होना। इन परिस्थितियों में पुत्रों के द्वारा किसी आवश्यकता को देखते हुए पिता के जीवनकाल में, उसकी प्रसन्नता से, उसकी सम्पत्ति का विभाजन किया जा सकता है। पितैव वा स्वयं पुत्रान्विभजेद्वयसि स्थितः। ज्येष्ठं वा श्रेष्ठभागेन यथा वास्य मतिर्भवेत् ॥४॥ पुत्रों की किसी मांग, अनुरोध आदि के न होने पर पिता अपने जीवनकाल में अपनी इच्छा से अपनी सम्पत्ति का विभाजन करने को स्वतन्त्र है। वह चाहे, तो बड़े बेटे को कुछ अधिक भाग दे सकता है। सत्य तो यह है कि वह अपने पुत्रों को अपनी इच्छानुसार न्यूनाधिक देने को पूर्ण स्वतन्त्र है। विभृयाद्वेच्छतः सर्वान् ज्येष्ठो भ्राता यथा पिता। भ्राता शक्तः कनिष्ठो वा शक्त्यपेक्षाः कुले श्रियः ॥५॥ पिता के परलोक सिधारने पर पैतृक सम्पत्ति का भाइयों में विभाजन अनिवार्य नहीं है। ज्येष्ठ भ्राता भी पिता के समान परिवार का मुखिया बनकर, परिवार के सभी सदस्यों के भरण पोषण का दायित्व संभाल सकता है। ज्येष्ठ भ्राता के स्थान 224 / नारदस्मृति