नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ
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पर इस दायित्व को छोटा भाई भी ले सकता है; क्योंकि दायित्व का निर्वहण आयु की अपेक्षा सामर्थ्य पर निर्भर है। समर्थ व्यक्ति ही परिवार में सुख-समृद्धि ला सकता है। अतः कोई भी समर्थ भाई—ज्येष्ठ, मध्यम अथवा कनिष्ठ—परिवार को संयुक्त बनाये रख सकता है। सभी भाइयों के साथ रहने को सहमत होने पर तथा एक-दूसरे से सन्तुष्ट होने पर विभाजन की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती। शौर्यभार्याधने चोभे यच्च विद्याधनं भवेत्। त्रीण्येतान्यविभाज्यानि प्रसादी यश्च पैतृकः ॥ 6 ॥ निम्नोक्त चार प्रकार के धन अविभाज्य हैं—एक भाई से दूसरे भाई इस प्रकार के धन के विभाजन की मांग नहीं कर सकते—
- शौर्य से अर्जित धन—मल्लयुद्ध, धनुर्विद्या अथवा अन्य किसी प्रकार के साहसपूर्ण कार्य से पुरस्कार, पारितोषिक, उपहार तथा वृत्ति आदि के रूप में प्राप्त धन। आजकल की भाषा में क्रिकेट, हॉकी तथा चैस (शतरंज) आदि खेलों में विशिष्टता दिखाने पर मिलने वाला विदेशी धन तथा अर्जुन पुरस्कार आदि के साथ जुड़ा धन।
- भार्याधन—स्त्री द्वारा अपने मायके से लायी गयी चल-अचल सम्पत्ति तथा उसके द्वारा निजी व्यापार अथवा नौकरी आदि से अर्जित धन। मनु, याज्ञवल्क्य आदि के स्मृति-ग्रन्थों में निम्नोक्त छह प्रकार के धन को स्त्रीधन कहा गया है— (i) विवाह में दहेज के रूप में माता पिता से प्राप्त धन। (ii) विवाह के उपरान्त विदाई के समय स्त्री के जाति-बन्धुओं द्वारा उसे दिया गया धन। (iii) विवाह के उपरान्त घर आने पर वर के परिवारजनों द्वारा अपनी नववधू को अपनी प्रसन्नता से दिया गया धन। (iv) माता-पिता, भाइयों और जाति बन्धुओं से प्राप्त होने वाला धन। (v) विवाह के उपरान्त समय समय पर प्रसन्न हुए पति से प्राप्त धन तथा (vi) विवाह के उपरान्त स्त्री के भाई, बहिन आदि के विवाह, गृहप्रवेश आदि विशिष्ट मांगलिक अवसरों पर माता-पिता द्वारा गुप्त अथवा प्रकट रूप में दिया गया धन।
- विद्या-धन.—विद्या-प्राप्ति के उपरान्त सेवा-कार्य, पुस्तक लेखन अथवा निजी व्यवसाय—प्राइवेट प्रैक्टिस, डॉक्टर, वकील, चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट, ज्योतिषी तथा आर्किटेक्ट आदि से प्राप्त धन तथा
- पिता द्वारा अपनी प्रसन्नता से अपनी सम्पत्ति में से दिया गया भाग। नारदस्मृति / 225