भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 318 में से

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पृष्ठ 146

अध्याय ३८ ] कूर्मावतार; समुद्रमन्थन और मोहिनी-अवतार १३५ विष्णुना मुखभागे तु योजिता दानवास्तदा। देवताः पुच्छभागे तु मथनाय नियोजिताः ॥ १८ एवं च मथनात्तत्र मन्दरोऽधः प्रविश्य च। आधारेण विना राजन् तं दृष्ट्वा सहसा हरिः ॥ १९ सर्वलोकहितार्थाय कूर्मरूपमधारयत्। आत्मानं सम्प्रवेश्याथ मन्दरस्य गिरेरधः ॥ २० प्रविश्य धृतवान् शैलं मन्दरं मधुसूदनः। उपर्याक्रान्तवाञ्शैलं पृथग्रूपेण केशवः ॥ २१ चकर्ष नागराजं च देवैः सार्धं जनार्दनः। ततस्ते त्वरया युक्ता ममन्थुः क्षीरसागरम् ॥ २२ यावच्छक्त्या नृपश्रेष्ठ बलवन्तः सुरासुराः। मथ्यमानात्ततस्तस्मात् क्षीराब्धेरभवन्नृप ॥ २३ कालकूटमिति ख्यातं विषमत्यन्तदुस्सहम्। तं नागा जगृहुः सर्वे तच्छेषं शङ्करोऽग्रहीत् ॥ २४ नारायणाज्ञया तेन नीलकण्ठत्वमाप्तवान्। ऐरावतश्च नागेन्द्रो हरिश्चोच्चैःश्रवाः पुनः ॥ २५ द्वितीयावर्तनाद्राजन्नुत्पन्नाविति नः श्रुतम्। तृतीयावर्तनाद् राजन्नप्सराश्च सुशोभना ॥ २६ चतुर्थात् पारिजातश्च उत्पन्नः स महाद्रुमः। पञ्चमाद्धि हिमांशुस्तु प्रोत्थितः क्षीरसागरात् ॥ २७ तं भवः शिरसा धत्ते नारीवत् स्वस्तिकं नृप। नानाविधानि दिव्यानि रत्नान्याभरणानि च ॥ २८ क्षीरोदधेरुत्थिताश्च गन्धर्वाश्च सहस्रशः। एतान् दृष्ट्वा तथोत्पन्नानत्याश्चर्यसमन्वितान् ॥ २९ अभवञ्जातहर्षास्ते तत्र सर्वे सुरासुराः। देवपक्षे ततो मेघाः स्वल्पं वर्षन्ति संस्थिताः ॥ ३० कृष्णाज्ञया च वायुश्च सुखं वाति सुरान् प्रति। विर्षनिःश्वासवातेन वासुकेश्चापरे हताः ॥ ३१ हुआ। भगवान् विष्णुने उस समय समुद्रमन्थनके लिये दानवोंको वासुकिके मुखकी ओर और देवताओंको पुच्छ भागकी ओर नियुक्त किया। राजन्! इस प्रकार मन्थन आरम्भ होनेपर नीचे कोई आधार न होनेके कारण मन्दराचल जलके भीतर प्रविष्ट होकर डूब गया। पर्वतको डूबा देख भगवान् मधुसूदन विष्णुने समस्त लोकोंके हितके लिये सहसा कूर्मरूप धारण किया और उस रूपमें अपनेको मन्दराचलके नीचे प्रविष्ट करके, आधाररूप हो, उस मन्दर पर्वतको धारण किया तथा दूसरे रूपसे वे भगवान् केशव पर्वतको ऊपरसे भी दबाये रहे और एक अन्यरूपसे वे भगवान् जनार्दन देवताओंके साथ रहकर नागराज वासुकिको खींचते भी रहे। तब वे बलवान् देवता तथा असुर पूर्णशक्ति लगाकर बड़े वेगसे क्षीरसागरका मन्थन करने लगे ॥ १६-२२१/२ ॥ नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर उस मथे जाते हुए क्षीरसागरसे अत्यन्त दुस्सह 'कालकूट' नामक विष प्रकट हुआ। उस विषको सभी सर्पोंने ग्रहण कर लिया। उनसे बचे हुए विषको भगवान् विष्णुकी आज्ञासे शङ्करजीने पी लिया। इससे कण्ठमें काला दाग पड़ जानेके कारण उनकी 'नीलकण्ठ' संज्ञा हुई। इसके बाद द्वितीय बारके मन्थनसे ऐरावत गजराज और उच्चैःश्रवा घोड़ा-ये दोनों प्रकट हुए, यह बात हमारे सुननेमें आयी है। तृतीय आवृत्तिसे परमसुन्दरी अप्सरा (उर्वशी)-का आविर्भाव हुआ और चौथी बार महान् वृक्ष पारिजात प्रकट हुआ। पाँचवीं आवृत्तिमें क्षीरसागरसे चन्द्रमा प्रकट हुए। नरेश्वर! चन्द्रमाको भगवान् शिव अपने मस्तकपर धारण करते हैं; ठीक उसी तरह जैसे नारी ललाटमें स्वस्तिक (बेंदी या आभूषण) धारण करती है। इसी प्रकार क्षीरसागरसे नाना प्रकारके दिव्य रत्न, आभूषण और हजारों गन्धर्व प्रकट हुए। इन अत्यन्त विस्मयजनक वस्तुओंको उस प्रकार उत्पन्न देख सभी देवता और असुर बहुत प्रसन्न हुए ॥ २३-२९१/२ ॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुकी आज्ञासे मेघगण देवताओंके दलमें स्थित हो मन्द-मन्द वर्षा करने लगे और देव-वृन्दको सुख देनेवाली वायु बहने लगी। [इस कारण देवता थके नहीं।] किंतु महामते! वासुकिके विषमिश्रित श्वासकी वायुसे कितने ही दैत्य मर गये और जो बचे, In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth