संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 150, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४० ] नृसिंहावतार; हिरण्यकशिपुकी वरदान-प्राप्ति १३९ दितेः पुत्रो महानासीद्धिरण्यकशिपुः पुरा। | पूर्वकालमें दितिका पुत्र हिरण्यकशिपु महान् प्रतापी तपस्तेपे निराहारो बहुवर्षसहस्रकम्॥ २ | हुआ। उसने अनेक सहस्र वर्षोंतक निराहार रहते हुए तपतस्तस्य संतुष्टो ब्रह्मा तं प्राह दानवम्। | तपस्या की। उसकी तपस्यासे संतुष्ट हो ब्रह्माजीने उस वरं वरय दैत्येन्द्र यस्ते मनसि वर्तते॥ ३ | दानवसे कहा—'दैत्येन्द्र! तुम्हारे मनको जो प्रिय लगे, इत्युक्तो ब्रह्मणा दैत्यो हिरण्यकशिपुः पुरा। | वही वर माँग लो।' दैत्य हिरण्यकशिपुने ब्रह्माजीके इस उवाच नत्वा देवेशं ब्रह्माणं विनयान्वितः॥ ४ | प्रकार कहनेपर उन देवेश्वरसे विनयपूर्वक प्रणाम करके | कहा॥ २-४॥ हिरण्यकशिपुरुवाच | यदि त्वं वरदानाय प्रवृत्तो भगवन्मम। | हिरण्यकशिपु बोला—ब्रह्मन्! भगवन्! यदि आप यद्यद्वृणोम्यहं ब्रह्मांस्तत्तन्मे दातुमर्हसि॥ ५ | मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं जो-जो माँगता हूँ, न शुष्केण न चार्द्रेण न जलेन न वह्निना। | वह सब देनेकी कृपा करें। मैं न सूखी वस्तुसे मरूँ न न काष्ठेन न कीटेन पाषाणेन न वायुना॥ ६ | गीलीसे; न जलसे न आगसे; न काठसे न कीड़ेसे और नायुधेन न शूलेन न शैलेन न मानुषैः। | न पत्थर या हवासे ही मेरी मृत्यु हो। न शूल अथवा न सुरैरसुरैर्वापि न गन्धर्वैर्न राक्षसैः॥ ७ | किसी और शस्त्रसे न पर्वतसे; न मनुष्योंसे न देवता, न किन्नरैर्न यक्षैस्तु विद्याधरभुजंगमैः। | असुर, गन्धर्व अथवा राक्षसोंसे ही मरूँ। न किंनरोंसे न न वानरैर्मृगैर्वापि नैव मातृगणैरपि॥ ८ | यक्ष, विद्याधर अथवा भुजंगोंसे; न वानर तथा अन्य नाभ्यन्तरे न बाह्ये तु नान्यैर्मरणहेतुभिः। | पशुओंसे और न दुर्गा आदि मातृगणोंसे ही मेरी मृत्यु न दिने न च नक्तं मे त्वत्प्रसादाद् भवेन्मृतिः॥ ९ | हो। मैं न घरके भीतर मरूँ न बाहर; न दिनमें मरूँ न इति वै देवदेवेशं वरं त्वत्तो वृणोम्यहम्। | रातमें तथा आपकी कृपासे मृत्युके हेतुभूत अन्य कारणोंसे | भी मेरी मृत्यु न हो। देवदेवेश्वर! मैं आपसे यही वर मार्कण्डेय उवाच | माँगता हूँ॥ ५-९ १/२॥ इत्युक्तो दैत्यराजेन ब्रह्मा तं प्राह पार्थिव॥ १० | मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! दैत्यराज तपसा तव तुष्टोऽहं महता तु वरानिमान्। | हिरण्यकशिपुके यों कहनेपर ब्रह्माजीने उससे कहा— दुर्लभानपि दैत्येन्द्र ददामि परमाद्भुतान्॥ ११ | 'दैत्येन्द्र! तुम्हारे महान् तपसे संतुष्ट होकर मैं इन परम अन्येषां नेदृशं दत्तं न तैरित्थं तपः कृतम्। | अद्भुत वरोंको दुर्लभ होनेपर भी तुम्हें दे रहा हूँ। दूसरे त्वत्प्रार्थितं मया दत्तं सर्वं ते चास्तु दैत्यप॥ १२ | किसीको मैंने ऐसा वर नहीं दिया है और न दूसरोंने गच्छ भुङ्क्ष्व महाबाहो तपसामूर्जितं फलम्। | ऐसी तपस्या ही की है। दैत्यपते! तुम्हारे माँगे हुए सभी इत्येवं दैत्यराजस्य हिरण्यकशिपोः पुरा॥ १३ | वर मैंने तुम्हें दे दिये; वे सब तुम्हें प्राप्त हों। महाबाहो! दत्त्वा वरान् ययौ ब्रह्मा ब्रह्मलोकमनुत्तमम्। | अब जाओ और अपने तपके बढ़े हुए उत्कृष्ट फलको सोऽपि लब्धवरो दैत्यो बलवान् बलदर्पितः॥ १४ | भोगो।' इस प्रकार पूर्वकालमें दैत्यराज हिरण्यकशिपुको देवान् सिंहान् रणे जित्वा दिवः प्राच्यावयद् भुवि। | अभीष्ट वर देकर ब्रह्माजी अपने परम उत्तम लोकको दिवि राज्यं स्वयं चक्रे सर्वशक्तिसमन्वितम्॥ १५ | चले गये। उस बलवान् दैत्यने भी वर पाकर बलसे | उन्मत्त हो श्रेष्ठ देवताओंको युद्धमें जीतकर उन्हें स्वर्गसे | पृथ्वीपर गिरा दिया तथा वह स्वयं स्वर्गलोकमें रहकर | वहाँका सर्वशक्तिसम्पन्न राज्य भोगने लगा॥ १०-१५॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth