संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 151, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१४० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४०
देवा अपि भयात्तस्य रुद्राश्चैवर्षयो नृप। विचेरुरवनौ सर्वे बिभ्राणा मानुषीं तनुम्॥ १६ प्राप्तत्रैलोक्यराज्योऽसौ हिरण्यकशिपुः प्रजाः। आहूय सर्वा राजेन्द्र वाक्यं चेदमभाषत॥ १७ न यष्टव्यं न होतव्यं न दातव्यं सुरान् प्रति। युष्माभिरहमेवाद्य त्रैलोक्याधिपतिः प्रजाः॥ १८ ममैव पूजां कुरुत यज्ञदानादिकर्मणा। ताश्च सर्वास्तथा चक्रुर्दैत्येन्द्रस्य भयान्नृप॥ १९ यत्रैवं क्रियमाणेषु त्रैलोक्यं सचराचरम्। अधर्मयुक्तं सकलं बभूव नृपसत्तम॥ २० स्वधर्मलोपात् सर्वेषां पापे मतिरजायत। गते काले तु महति देवाः सेन्द्रा बृहस्पतिम्॥ २१ नीतिज्ञं सर्वशास्त्रज्ञं पप्रच्छुर्वि नयान्विताः। हिरण्यकशिपोरेस्य विनाशं मुनिसत्तम॥ २२ त्रैलोक्यहारिणः शीघ्रं वधोपायं वदस्व नः।
बृहस्पतिरुवाच शृणुध्वं मम वाक्यानि स्वपदप्राप्तये सुराः॥ २३ प्रायो हिरण्यकशिपुः क्षीणभागो महासुरः। शोको नाशयति प्रज्ञां शोको नाशयति श्रुतम्॥ २४ शोको मतिं नाशयति नास्ति शोकसमो रिपुः। सोढुं शक्योऽग्निसम्बन्धः शस्त्रस्पर्शश्च दारुणः॥ २५ न तु शोकभवं दुःखं संसोढुं नृप शक्यते। कालानिमित्ताच्च वयं लक्ष्यामस्तत्क्षयं सुराः॥ २६ बुधाश्च सर्वे सर्वत्र स्थिता वक्ष्यन्ति नित्यशः। अचिरादेव दुष्टोऽसौ नश्यत्येव परस्परम्॥ २७ देवानां तु परामृद्धिं स्वपदप्राप्तिलक्षणाम्। हिरण्यकशिपोर्नाशं शकुनानि वदन्ति मे॥ २८ यत एवमतो देवाः सर्वे गच्छत माचिरम्। क्षीरोदस्योत्तरं तीरं प्रसुप्तो यत्र केशवः॥ २९ युष्माभिः संस्तुतो देवः प्रसन्नो भवति क्षणात्। स हि प्रसन्नो दैत्यस्य वधोपायं वदिष्यति॥ ३०
नरेश्वर! इन्द्रादि देवता, रुद्र तथा ऋपिगण भी उसके भयसे मनुष्यरूप धारणकर पृथ्वीपर विचरते थे। राजेन्द्र! त्रिभुवनका राज्य प्राप्त कर लेनेपर हिरण्यकशिपुने समस्त प्रजाओंको बुलाकर उनसे यह वाक्य कहा—'प्रजागण! तुम लोग देवताओंके लिये यज्ञ, होम और दान न करो। अब मैं ही त्रिभुवनका अधीश्वर हूँ; अतः यज्ञ और दानादि कर्मोंद्वारा मेरी ही पूजा करो।' राजन्! यह सुनकर वे सभी प्रजाएँ उसके भयसे वैसा ही करने लगीं। नृपश्रेष्ठ! वहाँ ऐसा व्यवहार चालू होनेपर चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिभुवन अधर्मपरायण हो गया। स्वधर्मका लोप हो जानेसे सबकी बुद्धि पापमें प्रवृत्त हो गयी। इस तरह बहुत समय बीतनेपर इन्द्रसहित सब देवताओंने मिलकर समस्त शास्त्रोंके ज्ञाता तथा नीतिवेत्ता बृहस्पतिजीसे विनयपूर्वक पूछा—'मुनिश्रेष्ठ! त्रिलोकीका राज्य छीननेवाले इस हिरण्यकशिपुके विनाशका समय और उसका उपाय हमें शीघ्र बताइये'॥ १६–२२ १/२॥
बृहस्पतिजी बोले—देवताओ! तुम लोग अपने स्थानकी प्राप्तिके लिये मेरे ये वाक्य सुनो—'इस महान् असुर हिरण्यकशिपुके पुण्यका अंश प्रायः क्षीण हो चुका है। [इसे अपने भाई हिरण्याक्षकी मृत्युसे बहुत शोक हुआ है।] यह शोक बुद्धिको नष्ट और शास्त्रज्ञानको चौपट कर देता है, विचारशक्तिको भी क्षीण कर डालता है; अतः शोकके समान कोई शत्रु नहीं है। नरेश्वर! अपने शरीरपर अग्निका स्पर्श और दारुण शस्त्र-प्रहार भी सहा जा सकता है, परंतु शोकजन्य दुःखका सहन नहीं किया जा सकता। देवताओ! इस शोकसे और कालरूप निमित्तसे हम हिरण्यकशिपुका नाश निकट देख रहे हैं। इसके अतिरिक्त सभी विद्वान् सर्वत्र परस्पर यही कहा करते हैं कि दुष्ट हिरण्यकशिपु अब शीघ्र ही नष्ट होनेवाला है। मेरे शकुन भी यही बताते हैं कि देवताओंको अपने पद— स्वर्ग-साम्राज्यकी प्राप्तिरूप महती समृद्धि मिलनेवाली है और हिरण्यकशिपुका नाश होना चाहता है। चूँकि ऐसा ही होनेवाला है, इसलिये तुम सभी देवता क्षीरसागरके उत्तरतटपर, जहाँ भगवान् विष्णु शयन करते हैं, शीघ्र ही जाओ। तुम लोगोंके भलीभाँति स्तवन करनेपर वे भगवान् क्षणभरमें ही प्रसन्न हो जायँगे और प्रसन्न होनेपर वे ही उस दैत्यके वधका उपाय बतायेंगे॥ २३–३०॥
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