संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४० सारथिः सात्त्विकः स्वामी सामवेदप्रियः समः। शंकर, शांतनुस्तुत, सारथि, सात्त्विक, स्वामी, सामवेदप्रिय, सावनः साहसी सत्त्वः सम्पूर्णांशः समृद्धिमान्॥४९ सम, सावन, साहसी, सत्त्व, सम्पूर्णांश, समृद्धिमन्, स्वर्गद, स्वर्गदः कामदः श्रीदः कीर्तिदः कीर्तिनाशनः। कामद, श्रीद, कीर्तिद, कीर्तिनाशन, मोक्षद, पुण्डरीकाक्ष, मोक्षदः पुण्डरीकाक्षः क्षीराब्धिकृतकेतनः॥५० क्षीराब्धिकृतकेतन, सुरासुरैःस्तुत, प्रेरक और पापनाशन आदि स्तुतः सुरासुरैरीश प्रेरकः पापनाशनः। नामोंसे कहे जानेवाले परमेश्वर! आप ही यज्ञ, वषट्कार, ॐकार तथा आहवनीयादि अग्निरूप हैं। पुरुषोत्तम! देव! त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोंकारस्त्वमग्रयः॥५१ आप ही स्वाहा, स्वधा और सुधा हैं, आप सनातन देवदेव त्वं स्वाहा त्वं स्वधा देव त्वं सुधा पुरुषोत्तम। भगवान् विष्णुको नमस्कार है। गरुडध्वज! आप प्रमाणोंके नमो देवादिदेवाय विष्णवे शाश्वताय च॥५२ अविषय तथा अनन्त हैं॥३६-५२१/२॥ अनन्तायाप्रमेयाय नमस्ते गरुडध्वज। मार्कण्डेयजी बोले-इन दिव्य नामोंद्वारा स्तुति किये जानेपर भगवान् मधुसूदनने प्रत्यक्ष प्रकट होकर मार्कण्डेय उवाच सम्पूर्ण देवताओंसे यह वचन कहा॥५३१/२॥ इत्येतैर्नामभिर्दिव्यैः संस्तुतो मधुसूदनः॥५३ श्रीभगवान् बोले-देवगण! तुम लोगोंने केवल उवाच प्रकटीभूत्वा देवान् सर्वानिदं वचः। कल्याणकारी नामोंद्वारा मेरा स्तवन किया है, अतः मैं तुमपर प्रसन्न हूँ; कहो, तुम्हारा क्या कार्य सिद्ध श्रीभगवानुवाच करूँ?॥५४१/२॥ युष्माभिः संस्तुतो देवा नामभिः केवलैः शुभैः॥५४ देवता बोले-हे देवदेव! हे हृषीकेश! हे अत एव प्रसन्नोऽस्मि किमर्थं करवाणि वः। कमलनयन! हे लक्ष्मीपते! हे हरे! आप तो सब कुछ जानते हैं; फिर हमसे क्यों पूछ रहे हैं?॥५५१/२॥ देवा ऊचुः श्रीभगवान् बोले-असुरनाशक देवताओ! तुम देवदेव हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव॥५५ लोगोंके आनेका सारा कारण मुझे ज्ञात है। जगत्का त्वमेव जानासि हरे किं तस्मात् परिपृच्छसि। कल्याण करनेवाले महादेवजीने तथा तुमने हिरण्यकशिपु दैत्यका नाश करानेके लिये मेरे एक सौ पुण्यनामोंद्वारा श्रीभगवानुवाच मेरा स्तवन किया है। महामते शिव! तुम्हारे कहे हुए युष्मदागमनं सर्वं जानाम्यसुरसूदनाः॥५६ इन सौ नामोंसे जो मेरा नित्य स्तवन करेगा, उस हिरण्यकविनाशार्थं स्तुतोऽहं शङ्करेण तु। पुरुषद्वारा मैं उसी प्रकार प्रतिदिन पूजित होऊँगा, जैसे पुण्यनामशतेनैव संस्तुतोऽहं भवेन च॥५७ इस समय तुम्हारे द्वारा हुआ हूँ। देव शम्भो! मैं तुमपर एतेन यस्तु मां नित्यं त्वयोक्तेन महामते। प्रसन्न हूँ, अब तुम अपने शुभ कैलासशिखरको जाओ। तेनाहं पूजितो नित्यं भवामीह त्वया यथा॥५८ तुमने मेरी स्तुति की है, अतः तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मैं हिरण्यकशिपुका वध करूँगा। देवताओ! अब तुम भी प्रीतोऽहं गच्छ देव त्वं कैलासशिखरं शुभम्। जाओ और कुछ कालतक प्रतीक्षा करो। जब इस त्वया स्तुतो हनिष्यामि हिरण्यकशिपुं भव॥५९ हिरण्यकशिपुके प्रह्लाद नामक बुद्धिमान् विष्णुभक्त पुत्र गच्छध्वमधुना देवाः कालं कंचित् प्रतीक्षताम्। होगा और जिस समय यह दैत्य प्रह्लादसे द्रोह करेगा, उस यदास्य तनयो धीमान् प्रह्लादो नाम वैष्णवः॥६० समय वरोंसे रक्षित होकर देवताओं और दानवोंसे भी तस्य द्रोहं यदा दैत्यः करिष्यति सुरांस्तदा। नहीं जीते जा सकनेवाले इस असुरका मैं अवश्य वध हनिष्यामि वरैर्गुप्तमजेयं देवदानवैः। कर डालूँगा। राजन्! भगवान् विष्णुके इस प्रकार कहनेपर इत्युक्त्वा विष्णुना देवा नत्वा विष्णुं ययुर्नृप॥६१ देवगण उन्हें प्रणाम करके चले गये॥५६-६१॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे विष्णोर्नामस्तोत्रं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः॥४०॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'विष्णुका नाममय स्तोत्र' नामक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥४०॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth