संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४१ ] प्रह्लादकी उत्पत्ति और उनकी हरि-भक्तिसे हिरण्यकशिपुकी उद्विग्नता १४३ इकतालीसवाँ अध्याय प्रह्लादकी उत्पत्ति और उनकी हरि-भक्तिसे हिरण्यकशिपुकी उद्विग्नता सहस्रानीक उवाच मार्कण्डेय महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । प्रादुर्भावं नृसिंहस्य यथावद्वक्तुमर्हसि ॥ १ वद प्रह्लादचरितं विस्तरेण ममानघ । धन्या वयं महायोगिंस्त्वत्प्रसादान्महामुने ॥ २ सुधां पिबामो दुर्लभां धन्याः श्रीशकथाभिधाम् । श्रीमार्कण्डेय उवाच पुरा हिरण्यकशिपोस्र्तपोऽर्थं गच्छतो वनम् ॥ ३ दिग्दाहो भूमिकम्पश्च जातस्तस्य महात्मनः । वारितो बन्धुभिर्भृत्यैर्मित्रैश्च हितकारिभिः ॥ ४ शकुना विगुणा राजञ्जातास्तच्च न शोभनम् । त्रैलोक्याधिपतिस्त्वं हि सर्वे देवाः पराजिताः ॥ ५ तवास्ति न भयं सौम्य किमर्थं तप्यते तपः । प्रयोजनं न पश्यामो वयं बुद्ध्या समन्विताः ॥ ६ यो भवेन्न्यूनकामो हि तपश्चर्यां करोति सः । एवं तैर्वार्यमाणोऽपि दुर्मदो मदमोहितः ॥ ७ यातः कैलासशिखरं द्वित्रैर्मित्रैः परिवृतः । तस्य संतप्यमानस्य तपः परमदुष्करम् ॥ ८ चिन्ता जाता महीपाल विरिञ्चेः पद्मजन्मनः । किं करोमि कथं दैत्यस्तपसो विनिवर्तते ॥ ९ इति चिन्ताकुलस्यैव ब्रह्मणोऽङ्गसमुद्भवः । प्रणम्य प्राह भूपाल नारदो मुनिसत्तमः ॥ १० नारद उवाच किमर्थं खिद्यते तात नारायणपरायण । येषां मनसि गोविन्दस्ते वै नार्हन्ति शोचितुम् ॥ ११ अहं तं वारयिष्यामि तप्यन्तं दितिनन्दनम् । नारायणो जगत्स्वामी मतिं मे सम्प्रदास्यति ॥ १२ सहस्रानीकने कहा—सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता महाप्राज्ञ मार्कण्डेयजी ! आप भगवान् नृसिंहके प्रादुर्भावकी कथा यथोचितरूपसे कहें। अनघ ! भक्तवर प्रह्लादजीका चरित्र मुझे विस्तारपूर्वक सुनायें। महायोगिन् ! महामुने ! हम लोग धन्य हैं; क्योंकि आपकी कृपासे हमें भगवान् विष्णुकी कथारूप दुर्लभ सुधाका पान करनेका अवसर मिला है ॥ १-२१/२॥ श्रीमार्कण्डेयजी बोले—पूर्वकालमें एक समय वह महाकाय हिरण्यकशिपु जब तपस्या करनेके लिये वनमें जानेको उद्यत हुआ, उस समय समस्त दिशाओंमें दाह और भूकम्प होने लगा। यह देखकर उसके हितकारी बन्धुओं, मित्रों और भृत्योंने उसे मना किया—'राजन् ! इस समय बुरे शकुन हो रहे हैं। इनका फल अच्छा नहीं है। सौम्य ! आप त्रिभुवनके एकच्छत्र स्वामी हैं, समस्त देवताओंपर आपने विजय प्राप्त की है, आपको किसीसे भय भी नहीं है; फिर किसलिये तप करना चाहते हैं? हम सभी लोग जब अपनी बुद्धिसे विचारते हैं, तब कोई भी प्रयोजन नहीं दिखायी देता [जिसके लिये आपको तप करनेकी आवश्यकता हो]; क्योंकि जिसकी कामना अपूर्ण होती है, वही तपस्या करता है' ॥ ३-६१/२॥ अपने बन्धुजनोंके इस प्रकार मना करनेपर भी वह दुर्मद एवं मदमत्त दैत्य अपने दो-तीन मित्रोंको साथ लेकर (तपके लिये) कैलास-शिखरको चला ही गया। महीपाल ! वहाँ जाकर जब वह परम दुष्कर तपस्या करने लगा, तब पद्मयोनि ब्रह्माजीको उसके कारण बड़ी चिन्ता हो गयी। वे सोचने लगे—'अहो ! अब क्या करूँ? वह दैत्य कैसे तपसे निवृत्त हो ?' भूपाल ! इस चिन्तासे ब्रह्माजी जब व्याकुल हो रहे थे, उसी समय उनके अङ्गसे उत्पन्न मुनिवर नारदजीने उन्हें प्रणाम करके कहा— ॥ ७-१० ॥ नारदजी बोले—पिताजी ! आप तो भगवान् नारायणके आश्रित हैं, फिर आप क्यों खेद कर रहे हैं? जिनके हृदयमें भगवान् गोविन्द विराजमान हैं, उन्हें इस प्रकार सोच नहीं करना चाहिये। तपस्यामें प्रवृत्त हुए उस दैत्य हिरण्यकशिपुको मैं उससे निवृत्त करूँगा। जगदीश्वर भगवान् नारायण मुझे इसके लिये सुबुद्धि देंगे ॥ ११-१२ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth