भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 318 में से

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पृष्ठ 156

अध्याय ४१ ] प्रह्लादकी उत्पत्ति और उनकी हरि-भक्तिसे हिरण्यकशिपुकी उद्विग्नता १४५ तेन मे मनसि क्रोधो जातोऽतीव वरानने। वरानने! पक्षियोंके उस शब्दको सुनकर मेरे मनमें बड़ा कोदण्डे शरमाधाय यावन्मुञ्चामि भामिनि॥ २६ क्रोध हुआ और भामिनि! उन्हें मारनेके लिये धनुषपर बाण चढ़ाकर ज्यों ही मैंने छोड़ना चाहा, त्यों ही वे दोनों तावत्तौ पक्षिणौ भीतौ गतौ देशान्तरं त्वहम्। पक्षी भयभीत हो उड़कर अन्यत्र चले गये। तब मैं भी त्यक्त्वा व्रतं समायातो भाविकार्यबलेन वै॥ २७ भावीकी प्रबलतासे अपना व्रत त्यागकर यहाँ चला आया ॥ २३—२७ ॥ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी कहते हैं—[हिरण्यकशिपु अपनी इत्युच्यमाने वचने वीर्यद्रावोऽभवत्तदा। पत्नीके साथ] जब इस प्रकार बातें कर रहा था, उसी ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते जातो गर्भस्तदैव हि॥ २८ समय उसका वीर्य स्खलित हुआ; पत्नीका ऋतुकाल तो प्राप्त था ही, तत्काल गर्भ स्थापित हो गया। माताके पुनः प्रवर्धमानस्य गर्भे गर्भस्य धीमतः। उदरमें बढ़ते हुए उस गर्भसे बुद्धिमान् नारदजीके उपदेशके नारदस्योपदेशेन वैष्णवः समजायत॥ २९ कारण विष्णुभक्त पुत्र उत्पन्न हुआ। भूप! इस प्रसङ्गको आगे कहूँगा; इस समय जो प्रसङ्ग चल रहा है, उसे तदग्रे कथयिष्यामि भूप श्रद्धापरो भव। श्रद्धापूर्वक सुनो। हिरण्यकशिपुका वह भक्त पुत्र प्रह्लाद तस्य सूनुरभूद्भक्तः प्रह्लादो जन्मवैष्णवः॥ ३० जन्मसे ही वैष्णव हुआ। जैसे पापपूर्ण कलियुगमें संसार- बन्धनसे मुक्त करनेवाली भगवान् श्रीहरिकी भक्ति बढ़ती सोऽवर्धतासुरकुले निर्मलो मलिनाश्रये। रहती है, उसी प्रकार उस मलिन कर्म करनेवाले यथा कलौ हरेर्भक्तिः पाशसंसारमोचनी॥ ३१ असुर-वंशमें भी प्रह्लाद निर्मल भावसे रहकर दिनोंदिन बढ़ने लगा। वह बालक त्रिलोकीनाथ भगवान् विष्णुके स वर्द्धमानो विरराज बालैः चरणोंमें बढ़ती हुई भक्तिके साथ ही स्वयं भी बढ़ता सह त्रयीनाथपदेषु भक्त्या। हुआ शोभा पा रहा था। शरीर छोटा होनेपर भी उस बालोऽल्पदेहो महतीं महात्मा बालकका हृदय महान् था; वह विष्णुभक्तिका प्रसार विस्तारयन् भाति स विष्णु भक्तिम्॥ ३२ करता हुआ उसी तरह शोभा पाता था, जैसे चौथा युग (कलियुग) [महत्त्वमें सब युगोंसे छोटा होकर भी] यथा चतुर्थं युगमासधर्म- भगवद्भजनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको देनेवाला कामार्थमोक्षं किल कीर्तिदं हि। तथा यशका विस्तार करनेवाला होता है। प्रह्लाद अन्य स बाललीलासु सहान्यडिम्भैः बालकोंके साथ खेलते, पहेली बुझाते और खिलौने प्रहेलिकाक्रीडनकेषु नित्यम्॥ ३३ आदिसे मनोरञ्जन करते समय तथा बातचीतके प्रसङ्गमें भी सदा भगवान् विष्णुकी ही चर्चा करता था; क्योंकि कथाप्रसङ्गेषु च कृष्णमेव उसका स्वभाव भगवन्मय हो गया था। इस प्रकार प्रोवाच यस्मात् स हि तत्स्वभावः। शैशव-कालमें भी विचित्र कार्य करनेवाला वह प्रह्लाद इत्थं शिशुत्वेऽपि विचित्रकारी भगवत्स्मरणरूपी अमृतका पान करता हुआ दिन-दिन व्यवर्द्धतेऽशस्मरणामृताशः ॥ ३४ बढ़ने लगा॥ २८-३४॥ एक दिन बहुत-सी स्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए दुष्ट तं पद्मवक्त्रं दैत्येन्द्रः कदाचित्स्त्रीवृतः खलः। दैत्यराज हिरण्यकशिपुने गुरुजीके घरसे आये हुए कमल- बालं गुरुगृहायातं ददर्श स्वायतेक्षणम्॥ ३५ से मुखवाले अपने बालक पुत्र प्रह्लादको देखा; उसकी In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth