भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 318 में से

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पृष्ठ 157

१४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१

गृहीत्वा तु करे पुत्रं पट्टिका या सुशोभना। आँखें बड़ी-बड़ी और सुन्दर थीं तथा वह हाथमें पट्टी मूर्ध्नि चक्राङ्किता पट्टी कृष्णनामाङ्किताऽऽदरात्॥ ३६ लिये हुए था। उसकी पट्टी बड़ी सुन्दर थी, उसके सिरेपर चक्रका चिह्न बना हुआ था और पट्टीपर आदरपूर्वक तमाहूय मुदाविष्टो लालयन् प्राह पुत्रकम्। श्रीकृष्णका नाम लिखा गया था। उसे देख हिरण्यकशिपुको पुत्र ते जननी नित्यं सुधीर्मे त्वा प्रशंसति॥ ३७ बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने पुत्रको पास बुलाकर उसे प्यार करते हुए कहा—'बेटा! तुम्हारी बुद्धिमती माता अथ तद्वद यत्किंचिद् गुरुवेश्मनि शिक्षितम्। मुझसे तुम्हारी बड़ी प्रशंसा किया करती है। अतः तुमने विचार्यानन्दजननं सम्यगायाति तद्वद॥ ३८ गुरुजीके घर जो कुछ सीखा है, वह मुझसे कहो। पहले सोच लो, जो तुम्हें बहुत आनन्ददायी प्रतीत होता हो और भलीभाँति याद हो, वही पाठ सुनाओ'॥ ३५—३८॥ अथाह पितरं हर्षात् प्रह्लादो जन्मवैष्णवः। यह सुनकर जन्मसे ही विष्णुकी भक्ति करनेवाले गोविन्दं त्रिजगद्वन्द्यं प्रभुं नत्वा ब्रवीमि ते॥ ३९ प्रह्लादने प्रसन्नतापूर्वक पितासे कहा—'त्रिभुवनके वन्दनीय भगवान् गोविन्दको प्रणाम करके मैं अपना पढ़ा हुआ पाठ आपको सुनाता हूँ।' अपने पुत्रके मुखसे इस प्रकार इति शत्रोः स्तवं श्रुत्वा पुत्रोक्तं स्त्रीवृतः खलः। शत्रु की स्तुति सुनकर स्त्रियोंसे घिरा हुआ वह दुष्ट दैत्य क्रुद्धोऽपि तं वञ्चयितुं जहासाच्चैः प्रहृष्टवत्॥ ४० यद्यपि बहुत क्रुद्ध हुआ, तथापि प्रह्लादसे उस क्रोधको छिपानेके लिये वह प्रसन्न पुरुषकी भाँति जोर-जोरसे आलिङ्ग्य तनयं प्राह शृणु बाल हितं वचः। हँसने लगा। फिर पुत्रको गलेसे लगाकर बोला—'बच्चा! राम गोविन्द कृष्णेति विष्णो माधव श्रीपते॥ ४१ मेरा हितकर वचन सुनो—बेटा! जो लोग 'राम, कृष्ण, गोविन्द, विष्णो, माधव, श्रीपते!' इस प्रकार कहा करते एवं वदन्ति ये सर्वे ते पुत्र मम वैरिणः। हैं, वे सभी मेरे शत्रु हैं; ऐसे लोग मेरे द्वारा शासित— शासितास्तु मयेदानीं त्वयेदं क्व श्रुतं वचः॥ ४२ दण्डित हुए हैं। तुमने यह हरिनामकीर्तन इस अवस्थामें कहाँ सुन लिया?'॥ ३९—४२॥ पितुर्वचनमाकर्ण्य धीमान्भयसंयुतः। पिताकी बात सुनकर बुद्धिमान् प्रह्लाद निर्भय होकर प्रह्लादः प्राह हे आर्य मैवं ब्रूयाः कदाचन॥ ४३ बोला—आर्य! आपको कभी ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। जो मनुष्य सम्पूर्ण ऐश्वर्योंको देनेवाले तथा धर्म सर्वैश्वर्यप्रदं मन्त्रं धर्मादिपरिवर्धनम्। आदिकी वृद्धि करनेवाले 'कृष्ण' इस मन्त्रका उच्चारण कृष्णोति यो नरो ब्रूयात् सोऽभयं विन्दते पदम्॥ ४४ करता है, वह अभय पदको प्राप्त कर लेता है। भगवान् कृष्णकी निन्दासे होनेवाले पापका कहीं अन्त नहीं कृष्णनिन्दासमुत्थस्य पातकस्यान्तो न विद्यते। है; अतः अब आप अपनी शुद्धिके लिये भक्तिपूर्वक राम माधव कृष्णेति स्मरन्मर्त्योऽमृतायते॥ ४५ 'राम, माधव और कृष्ण' इत्यादि नाम लेते हुए 'भगवान्‌का स्मरण करें। जो बात मैं आपसे कह रहा हूँ, गुरोरपि ब्रुवाणस्य हितकरं वचः। वह सबसे बढ़कर हितसाधक है, इसीलिये मेरे गुरुजन शरणं व्रज सर्वेशं सर्वपापक्षयंकरम्॥ ४६ होनेपर भी आपसे मैं निवेदन करता हूँ कि आप समस्त पापोंका क्षय करनेवाले सर्वेश्वर भगवान् विष्णुकी शरणमें जायें॥ ४३—४६॥

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