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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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106 साहिब बन्दगी

बैठो। कटड़े पहुँचे तो फिर उसने कहा कि यहाँ उतर जाओ। फिर खुद ही कहा कि अच्छा जाना कहाँ है? जम्भाल जी ने कहा कि अखनूर तक। वहाँ पहुँच गये। उसने कहा कि उतरो। फिर कहा कि अच्छा जाना कहाँ है? जम्भाल जी ने कहा कि बी. एस. एफ. के क्वार्टर तक। वहाँ पर पहुँचे तो कहा कि कितना दूर तक है? जम्भाल जी ने कहा कि आपका रास्ता दूसरा है, मेरा घर थोड़ी दूर है। मोटरसाइकिल वाले ने कहा कि घर छोड़कर आता हूँ। वहाँ पहुँचने पर उसने जम्भाल जी से कहा कि तुम चीज़ क्या हो, मैं तो तुम्हें छोड़ ही नहीं पा रहा था। मैं ऐसा हूँ ही नहीं। .....यह थे आप। आप ऐसे ही काम करते हैं। यह कोई एक नामी के साथ होने वाला किस्सा नहीं है और एक-दो बार होने वाला किस्सा भी नहीं है। राजू सरदार तो कहते हैं कि उनके साथ इतने करिश्में हो चुके हैं कि उन्हें याद भी नहीं हैं।

यह तो सत्य है कि आप पग-पग पर साथ देने के लिए तैयार रहते हैं। शर्त है कि श्रद्धा हो, विश्वास हो।


कोई वर्णन नहीं

कर सकता है

यदि कोई चाहे कि वो आपके गुणों का वर्णन करें तो निसंदेह यह नहीं हो पायेगा। वो वर्णन अधूरा ही रहेगा। अंत में उसे यही कहना होगा कि आप बहुत अच्छे हैं, आप बहुत ही निराले हैं। आपके गुणों का