निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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दे दी। तीनों भाई बड़े खुश हुए तीनों काम के वशीभूत उनमें रम गए। ऐसे में दैत्यों, देवताओं और राक्षसों की उत्पत्ति हुई। जगत की रचना शुरु हो गई।
ऐका माई जुगति वियाई तिनि चेले परवान।
एकु संसारी एकु भंडारी, एक लाये दिवान॥
सृष्टि रचना के लिए तीनों को अलग-अलग डिउटी दी गई। ब्रह्मा जी को उत्पत्ति करने की, विष्णु जी को पालनकर्ता की और शिवजी को संहारकर्त्ता का काम सौंपा गया। इसके आगे तेंतिस करोड़ देवी देवता जिनकी संसार किसी न किसी रूप में पूज रहा है यह सारा निरंजन का परिवार हुआ।
आओ, पाँच भोतिक तत्वों में से इसके अस्तित्व को देखें। चार तत्व तो हमें खुली आंखों से नजर आ रहे हैं लेकिन जो पांचवां तत्व आकाश तत्व है वह चारों तत्वों में रमा हुआ है, यह ही निरंजन है।
84 लाख योनियों में से जिस इंसानी देह को निरंजन ने अपने आप जैसा बनाया है, जिसको हरी मंदिर भी कहते हैं उसमें भी पांचवां तत्व जो आकाश तत्व है वहीँ काल पुरुष है। जो सभी शरीरों में मन रूप में रहता है। जब के जीव आत्मा का इस निरंजन के किसी भी देश, देवी, देवता व शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह तो निरंजन ने जीव आत्मा को रोकने के लिए 84 लाख किस्मों के कैद खाने बनाए हैं। जीव आत्मा जो सत्य पुरुष की अंश है यह बिना बाती और तेल के जलती है, यह बिना आंख के देखती है, बिना पांव चलती है, बिना कानों के सुनती है, इसे कोई काट नहीं सकता, इसे किसी का डर नहीं है। यह निडर है। इसका कभी भी अंत नहीं हो सकता।