निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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प्रेम के अथाह सागर हैं आप
आत्मा प्रेम से ओत-प्रोत है; उसमें प्रेम लबालब भरा हुआ है। आत्मपिता होने से आप प्रेम के अथाह सागर हैं। सागर की तो फिर भी एक थाह होती है, पर आपकी कोई थाह नहीं है। आप अथाह हैं, आपका प्रेम अथाह है। करोड़ों बड़ा-बड़ा प्रेम करने वाले प्रेमी भी आपमें समा जायेंगे और पता भी नहीं चल पायेगा।
यह आत्मा प्रेम की ही तलाश में है और यह प्रेम ही करना चाहती है। पर इसे प्रेम का सही रिस्पॉन्स नहीं मिल पाता है, इसलिए यह कभी संतुष्ट नहीं हो पाती है।
बाहर जहाँ भी प्रेम लगेगा, वो सच्चा नहीं होगा। वो शरीर की सीमा में आ ही जायेगा। वहाँ धोखा भी मिल सकता है। पर आपका प्रेम सत्य है, क्योंकि वो शरीर की सीमा से परे है। आपके यहाँ धोखा नहीं है। आपके पास से पूरा-पूरा सही जबाब मिलेगा।
एक माई आपके पास आई, बोली-गुरु जी! मैं जब छोटी थी, पढ़ती थी तो एक लड़के से प्रेम करने लगी। मैं प्रेम करना चाहती थी। वो भी मुझसे बहुत प्रेम करता था। पर कुछ देर बाद वो वासना पर उतर आया। मैंने उससे किनारा कर लिया। मुझे सच्चा प्रेमी नहीं मिल पाया। पर मैं प्रेम करना चाहती थी। इसलिए मैं फिर अपने ही मौहल्ले के एक लड़के से प्रेम करने लगी। पर कुछ देर बाद वो भी सही रिस्पॉन्स नहीं दे सका और वासना पर उतर आया। मैंने उससे भी किनारा कर लिया। मैं सच्चा प्रेमी चाहती थी। फिर मेरी शादी हो गयी और मैंने सोचा कि पति से ही प्रेम कर लेती हूँ। पर गुरु जी, पति तो जैसे सोचने लगा कि
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