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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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16 साहिब बन्दगी

आत्मा आपकी तरफ आकर्षित होती है

आत्मा ईश्वर की प्राप्ति चाहती है, परमात्मा को पाना चाहती है। हर वस्तु जिसका भी अंश है, उसके इर्द-गिर्द रहती है। जल समुद्र का अंश है, फेंको तो बहने लगता है और बहते-बहते अपने अंशी की तरफ जाने लगता है; आग जलाओ तो वो ऊपर की ओर ही उठती है, अपने अंशी की ओर जाना चाहती है। ऐसे ही सब आपकी तरफ खिंचे चले आते हैं। जो नाम पा लेता है, अंदर से आत्मा जान जाती है कि यह रिश्ता नया नहीं है, बल्कि बहुत पुराना है, इसलिए वो आपसे जुदा नहीं हो पाता है। वो बार-बार खिंचा चला आता है आपके पास। सत्संग तो एक बहाना है; यदि आप उलटी गिनती भी गिनें तो भी संगत ऐसे ही आपके पास आती रहेगी। आपके नामी को 1-2 नहीं, 3-4 भी नहीं, 8-10 बार महीने में आपके दर्शन करके भी चैन नहीं आता है। कई तो दिन में एक बार करके भी चैन नहीं पाते हैं और आपसे मिलने वाले उस अमृत को पाने के लिए दिन में 3-3 सत्संग सुनने पहुँच जाते हैं। चाहे दिन में 5-5 बार भी आपके दर्शन कर लिए जाएँ तो भी चैन नहीं आता है। सच ही कहती है आपकी संगत-

साहिब तुझसे मिलने का, सत्संग बहाना है।
दुनिया वाले क्या जानें, हमारा रिश्ता पुराना है ॥

आपके प्रेम का स्वाद चख चुकी आत्मा कहीं चैन पा ही कैसे सकती है! आपके प्रेम का आस्वादन करने वाले नामी का कहीं भी दिल लग ही नहीं सकता है। आपके प्रेम का आकर्षण ही कुछ ऐसा है कि माँ-बाप, भाई, बहन आदि किसी का प्रेम आकर्षित नहीं कर पाता है। सारा प्यार ही जैसे आप खींच लेते हैं; केवल कर्त्तव्य निभाने मात्र के लिए उनके बीच रहते हैं। आपके प्रेमी तो बस जैसे जबरन कर्त्तव्य निभाने मात्र को अपने घर-परिवार में नज़र आते हैं; पर वास्तव में अन्दर से वे आपके पास ही रहते हैं। उन्हें यह समझ नहीं आता है कि कहाँ जाएँ! उन्हें तो