निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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बस यही लगता है कि जहाँ आप हों, वहीं चले जाएँ। जब भी आप अपने प्रेमियों को याद करते हैं तो वे रुक नहीं पाते हैं, सब काम छोड़कर आपके पास पहुँच जाते हैं। तभी तो संगत कहती है-
जदों तारां खड़कदीयां, मेरे कोलों रुकेया नेइ जादां॥
सब महात्माओं से अलग हैं आप
किसी महापुरुष की पहचान दाढ़ी या जटाएँ नहीं है, इसलिए आपने इसकी ज़रूरत नहीं समझी, इसका सहारा नहीं लिया। कभी भभूत नहीं रमाई, बाल नहीं बढ़ाए, रँगे चोले नहीं पहने; सोचा कि बाहरी सहारा नहीं चाहिए। केवल भारत में आपका व्यक्तित्व है कि कोई चिह्न नहीं रखा। कुछ भिन्न-2 चिह्न रखकर इज्जत चाहते हैं। आपको इज्जत नहीं चाहिए। कुछ तो सत्संग में अपने लोगों को कहते हैं कि बीच-बीच में तालियाँ बजाते रहना..... हौसला बढ़ाने के लिए। फिर ताली से उसका क्या हाल होगा! वो तो नीचे गिर जाएगा। ‘अस्तुति निंदा नाहिं जिन, बैरी मीत समान। कह नानक सुन रे मना, मुक्त ताहि को जान॥’ महात्माओं के रहन-सहन को देख आपको दुख होता है। कोई साथ में बॉडीगार्ड लेकर घूम रहा है, कोई कमांडो, कोई लाल बत्ती का सहारा लेकर घूम रहा है। आपको भी सरकार ने एक बॉडीगार्ड दिया था। वो नाम भी नहीं लिया। मोटू-सा था। उसने सोचा कि यहाँ तो आज़ादी है, मिठाइयाँ वगैरह खाने को हैं, कोई टेंशन भी नहीं है। पर आपको वो चुभा। आपने अपने लोगों को कहा कि इसे हटाओ। मेरी संगत कह रही है कि साहिब जी असां डोरां तेरे उते सुट्टियाँ।’ इस बंदूक वाले को देख उनके दिल में आयेगा कि साहिब ने अपनी डोरें इस पर फेंकी हुई हैं ....रक्षा के लिए। इसलिए कहा कि इसे दूर करो।
एक ने आपसे कहा कि गाड़ी में लाल बत्ती लगवा लो; बड़ी संगत हो गयी है; आपको मंजूरी मिल जायेगी। आपने कहा कि नहीं