निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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साहिब बन्दगी
लगानी है। जो गाड़ी रोशनी देती है, वही रहने दो। जिनको मंजूरी नहीं है, वे भी लगाए हुए हैं। ऐसा इसलिए करते हैं कि दिखाते हैं कि हम भी कुछ हैं। पर यह कोई महात्मा की निशानी नहीं है; यह तो दिखावे वाली बात है कि मैं खास आदमी हूँ।
शीश उतारे भूईँ धरे, तापर राखे पाँव। कहें कबीर धर्मदास से, ऐसा होय तो आव॥
ये महात्मा नहीं हैं। आपकी जान को तो बड़ा ख़तरा भी है। आपके लिए 10 लाख की सुपारी भी दी। आप नहीं डरे। आपके लोग डरे; उन्होंने अपने घरों से तस्वीरें निकाल दीं। क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्हें मजबूर किया गया, धमकाया गया। आपने कहा कि ऐसा मत करो, बाद में पछताओगे। आप बेपरवाह रहे।
.....तो आपने कहा कि बॉडिगार्ड नहीं चाहिए। एक तो वो बात थी; फिर दूसरी बात थी कि वो मोटू था। आपने विचार किया कि जब तक कोई हमला करेगा, तब तक यह तो फैसला भी नहीं कर पायेगा जबकि मैं हमलावर की रिवालवर ही छीन लूँगा। क्योंकि आप फौज में रहे हैं; यही तो सीखा है। आप Quick Reaction Team के कमाण्डर भी रहे हैं। वो तो बार-बार पैंट ऊँची करता था; ऐसा लगता था कि ज़मीन में गिर जाएगी। तो कोई बात होती तो पहले अपनी पैंट ठीक करता, इसलिए आपने सोचा कि इसकी ज़रूरत नहीं है। फिर संतों को यह सब शोभा ही नहीं देता है। मुख्य बात यह है। कबीर साहिब का कौन सा बॉडिगार्ड था, नानक देव जी का कौन बॉडिगार्ड था! पर बलिहारी कलयुग के महात्माओं की।
एक आदमी आपके पास आया और कहा कि नाम दो। आपने कहा कि पहले कुछ सत्संग सुनो, तुम नये लग रहे हो। उसने कहा- महाराज! मेरी उम्र 55 साल हो गयी है; कब स्वाँस छूट जाए, कोई पता नहीं। उसने बताया; कहा कि मैं भारत वर्ष के बड़े-बडे पंथों को देखा,