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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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40 साहिब बन्दगी

जब भी आवाज़ दें तो इन्हें खिला देना। जब एक दिन वो गया तो एक गाय पंखे की तरफ देखने लगी। वो कह रही थी कि चलाओ, हमें गर्मी लग रही है।

हित अनहित पशु पक्षिन जाना। मानव तन गुण ज्ञान निदाना ॥

इसलिए आप सभी में एक आत्मा देखते हैं, उनके दुख को भी समझते हैं।

एक ने आपको कहा कि मैं आपको दो भैंसे दान में देना चाहता हूँ। आपने पूछा कि तुम्हारे पास कितनी भैंसे हैं? उसने कहा-दो। आपने कहा कि फिर एक ही दो। उसने कहा कि एक भैंस के दो ही थन हैं, पर वो अच्छी है, दूध बहुत देती है। 3-4 महीने बाद बच्चा देगी।

आपने उसे अखनूर में रखा। 15 दिन में एक बार जब जाते तो टोकरी-भर रोटी खिलाते। वो आपसे बातें करती थी, अपने विचार रखती थी। जब कट्टा हुआ तो वो 10 किलो दूध देने लगी। भैंस का 1 किलो दूध गाय के 4 किलो दूध के बराबर होता है। कुछ समय बाद वो कम दूध देने लगी। उसकी देखभाल करने वाले बाबे ने कहा कि इसे ले जाओ; यह कभी दूध देती है, कभी नहीं। आपने कहा कि इसकी देखभाल करो अच्छी तरह। उसने कहा कि इसे राँजड़ी में भेज दो। पर जब उसे भेजने लगे तो वो जा ही नहीं रही थी। बड़ी मुश्किल से आपने उसे राँजड़ी भेजा। उसे पता था कि यहाँ सबकुछ अच्छा है, बड़ी सेवा होती है। वो आपसे सवाल कर रही थी कि इतने दिन दूध दिया, भूल गये। आपने कहा कि चिंता मत करो, वहाँ भी अच्छी सेवा होगी।

आपके पास एक आदमी आया; वो रो पड़ा, कहा कि यह तन आपका है, धन भी आपका है, मैं अपना कभी नहीं माना। आप कैसे हैं, यह भी मैं जानता हूँ। वो बोला कि आपके आश्रम के साथ मेरी ज़मीन है, उसे आपके लोगों ने कवर् किया है; जब मैंने कहा तो उन्होंने कहा कि हमारी है। उन्होंने फिर आपसे शिकायत की और आप नाराज़ हुए;