भारतकोश
निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

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42 साहिब बन्दगी

हाथ से या कपड़े से ज़मीन पर फेंक देते हैं, जिससे वो बेहोश हो जाता है और बाद में उड़कर चला जाता है। मच्छर ही नहीं, हरेक जीव के प्रति आप दया की भावना रखते हैं, उन्हें कोई भी कष्ट पहुँचाना नहीं चाहते हैं।

आपके आगे मन का ज़ोर नहीं चलता है

शरीर में रहकर आत्मिक व्यवहार करना बड़ा कठिन है। पर आप यह भी कर लेते हैं। एक समय था जब आप कभी भोजन नहीं खाते थे। मन कहता था कि खाओ, नहीं तो कमज़ोर हो जाओगे। आप कहते थे कि आत्मा कभी कमज़ोर होती है क्या! ओ मूर्ख मन! आत्मा को भोजन से क्या लेना! आप नहीं खाते थे। एक आदमी खा रहा था तो आपने सोचा कि इसे भी ज्ञान देता हूँ। आपने कहा कि यह तुम नहीं खा रहे हो, कोई और खा रहा है। तुझे इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। वो बड़ी ज़ोर से हँसा। वो बोला कि यह पागल हो गया है। आपने सोचा, अरे! गहराई में दुनिया वालों से बात नहीं करनी है।

आप इस शरीर में रहकर भी अपने में रहते हैं। एक ने आपका पाँव उठाया, कहा कि कितने गंदे हो; देखो, कितनी मैल जमी हुई है। यानी आप अपने शरीर को देखते भी नहीं थे। आप किसी से बात भी नहीं करते थे। पर शरीर में रहकर आत्मा का धर्म पालन करना बड़ा कठिन है।

आत्मा शरीर से छूटकर अमर-लोक गयी तो ठीक है। पर आपने शरीर में रहकर शरीर का धर्म पालन नहीं किया। स्वाँस भी नहीं लेते थे आप। एक पल भी नहीं सोते थे। सोना-जागना तो मन की वृत्ति है।

आपको मन भटका ही कैसे सकता है! यह किसी को भी भ्रमित कर देता है। जो भी इस संसार में आया, उसे भ्रमित कर देता है। धर्मदास जी को परम-पुरुष ने ही संसार में भेजा था ताकि जीवों का कल्याण हो। पर धर्मदास जी को भी काल ने अपने जाल में फँसा लिया। वे

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