भारतकोश
निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

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निराले सद्गुरु43

काल की ही भक्ति करने लगे और परम पुरुष को भूल गये। धर्म दास जी कबीर साहिब से बाद में जुड़े, कहने का भाव है कि मन किसी को भी भुला देता है, अपने में उलझा देता है। पर यह केवल आपसे ही डरता है। आपके आगे इसका ज़ोर नहीं चल पाता है। जब तक कबीर साहिब रहते हैं, तब तक संत-मत चलता है। बाद में यह लुप्त क्यों हो जाता है? इसका यही कारण है कि काल बाद में उलझा देता है। जब तक कबीर साहिब यानी आप संसार में रहते हैं तब तक यह मुरझाया रहता है, तब कुछ नहीं कर पाता है। कोई-कोई संत ही आपकी कृपा से इससे बचकर रह पाता है। अन्य उनके बाद में आने वाले फिर भूलते जाते हैं और संत मत लुप्त हो जाता है।

प्रोफेसर बोला-आप साधारण नहीं हैं

आप ट्रेन में यात्रा के दौरान अपने साथ जो होता है, उसे कह देते हैं कि किसी को मेरा परिचय नहीं देना है। क्योंकि आप बोलते ही रहते हैं। तो ट्रेन में आपको आराम का मौका मिल जाता है। वहाँ आप बुद्धू बनकर बैठ जाते हैं। यदि कोई कहे कि भारत के प्रधानमंत्री गुलामनबी जी हैं तो भी चुप रहते हैं, यह नहीं कहते हैं कि मनमोहन जी हैं। जानते हैं कि यदि बात की तो सिलसिला शुरू हो जायेगा।

एक बार एक प्रोफेसर आपके पास की सीट में था। उसने आपसे हठपूर्वक परिचय किया। आपने पिण्डा छुड़ाने के लिए कहा कि फौजी हूँ। यह झूठ भी नहीं है। वो बोला कि फौजी होंगे, पर आप कुछ हैं। आपने कहा कि मैं साधारण हूँ। प्रोफेसर मामूली नहीं था। वो विश्वविद्यालय में पढ़ाता था। वो बोला कि आप कोई महापुरुष हैं। आपने कहा कि आप कैसे कह सकते हैं? वो बोला कि कल से बैठे हो, न कुछ खाया, न बात की। हम दो-2 मिनट बाद उतरकर कुछ खा रहे हैं। फिर आप ध्यान में भी बैठे। ट्रेन हिल रही है, पर आपको तो जैसे कुछ ख़बर ही नहीं थी।