निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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संत अभिलाष दास जी ने कई पुस्तकें लिखी हैं, भारतवर्ष में मशहूर हैं। कबीर पंथी होने के कारण उन्होंने साहिब की वाणियों की टीका भी किया है। जब एक बार उन्होंने आपके प्रवचन सुने तो बड़े प्रभावित हुए। कबीर साहिब की वाणी का बहुत ज्ञान होने के कारण शायद उन्हें महसूस हो गया कि कबीर साहिब अपना दिया हुआ शब्द पूरा करने के लिए आ गये हैं। उन्होंने आपको अपना आश्रम ही दे दिया, कहा कि आप ही इसे संभालो। फिर कुछ समय बाद आपके दर्शन करने राँजड़ी में आए और आपको दो और आश्रम दे दिये।
एक माहत्मा का दूसरे महात्मा को समर्पण करना कोई आसान काम नहीं है। उसने पहले आपको बहुत परखा, तभी धीरे-2 सर्वस्व आपको समर्पित करते जा रहे हैं।
एक बार जब वो राँजड़ी में आपके दर्शनों को आए तो कहा कि घूमने जाना है। आपने आश्रम की गाड़ी दी; एक ड्राइवर भी दिया। उनके शिष्य भी साथ थे। आपके कार्य को देखकर अपने शिष्यों से बोले कि देखो, कैसे सेनापति की तरह कार्य चल रहा है! तब उन्होंने आपके चरणों की ओर देख मन-ही-मन बंदगी की ओर चल पड़े। जब वापिस आने लगे तो शिष्यों ने कहा कि हम वापिस राँजड़ी नहीं जायेंगे.... बहुत थक गये हैं। महात्मा जी के मुख से निकला कि गुरु जी का शब्द है कि मिलते जाना, इसलिए मैं उनका शब्द नहीं काट सकता; आप जाओ। वो महात्मा अकेले आए। क्योंकि वो आपको कुछ-कुछ समझ चुके थे कि आप संत नहीं बल्कि संतों की खान बनकर धरती पर आ गये हैं।
साहिब शब्द न काटिहौं, बोले संत अभिलाष।
बोले संत अभिलाष, हे शिष्यो! तुम जाओ;
हम तो रहेंगे, कुछ दिन साहिब पास ॥
दर्शन तो हम पायेंगे, न चाहें कोई साथ।