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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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निराले सद्गुरु <span style="float: right;">75</span>

एक शिष्य अपने गुरु के साथ नदी में नहा रहा था। वहाँ एक अँधा खड़ा था, जो ठीक से चल नहीं पा रहा था और गिर-गिर पड़ता था। चेले को दया आई, उसने गुरु जी से कहा कि इस पर कृपा करो, इसे ठीक कर दो। गुरु जी ने कहा कि भगवान ने इसे जैसा रखा है, रहने दो। पर चेले ने जिद्द की तो गुरु जी ने उसे ठीक कर दिया। अगले दिन जब वे नदी में नहाने आए तो वही अँधा लोगों को पकड़-पकड़कर नदी में डुबो रहा था। उसने चेले को भी पकड़ा। चेले ने कहा-गुरु जी, सोच क्या रहे हो, जल्दी से इसे अँधा करो। गुरु जी ने कहा कि मैंने तुम्हें पहले नहीं कहा था कि इसे रहने दो ऐसे ही। यह अँधा ही ठीक था।

...तो कई कारण होते हैं कि महात्मा लोग सबपर अपनी शक्ति नहीं लगाते हैं। यदि वही आदमी ठीक होकर गलत काम करने लग जाए तो फिर महात्मा भी उसके गलत कामों में शामिल हो जायेंगे। इसलिए वे इन झंझटों से दूर ही रहते हैं और यदि कृपा करते भी हैं तो सोच-समझकर।

यदि आप सबको कहकर जीवित करना शुरू कर दें तो राँजड़ी में लाशें ही लाशें पहुँच जायेंगी। फिर सत्संग सब समास हो जायेंगे और आपसे प्रेम करने वालों को आपके नज़दीक से दर्शन भी नसीब नहीं होंगे।

अब विश्वास रखने के लिए आप इसलिए कहते हैं कि यदि उसका विश्वास ही नहीं होगा, वो कहीं दूसरी जगह भी माथा मार रहा होगा तो ठीक होने के बाद वो समझेगा कि वो वहीं से ठीक हुआ है और फिर उसकी भक्ति खंडित हो जायेगी। इसलिए बहुत सी चीज़ें ध्यान में रखते हुए तब आप किसी पर कृपा करते हैं।

जैसे एक माई थी। उसे पुत्र नहीं था। दो बेटियाँ थीं। उसने आपसे प्रार्थना की। आपने कहा कि भरोसा रखना। पर तीसरी बार भी उसे पुत्र नहीं हुआ। वो आपके पास आई, कहा कि इस बार भी बेटी ही हुई है।