निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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आपने उसे चुपके से पूछा कि क्या तुमने संतोषी माता का व्रत नहीं रखा था? उसने अपनी भूल स्वीकार की। कहने का भाव है कि गुरु पर सब कुछ छोड़ा तो अन्य सहारा ढूँढ़ना ही नहीं है। यह तो चालाकी हुई गुरु से। यदि पुत्र हो जाता तो उसने कहना था कि संतोषी माता ने पुत्र दिया। संतोषी माता से आपका बैर नहीं है। पर गुरु-भक्ति खंडित हो जाती। इसलिए चाहे काम बने या न बने, गुरु शरण में ही रहना है। भाव यही होना चाहिए-
जीवन का अब सौंप दिया, सब भार तुम्हारे हाथों में।
है जीत तुम्हारे हाथों में, है हार तुम्हारे हाथों में॥
ज़रूरी नहीं है कि काम बने तभी समझो कि आप सच्चे हैं। नहीं। ऐसा बिलकुल नहीं समझना। कई बार आप भक्त लोगों को भक्ति में लगाने के लिए उनके काम नहीं करते हैं। उन्हें अभावों में रखते हैं, ताकि वे संसार से विरक्त होकर भक्ति कर सकें। इसलिए इस धोखे में नहीं रहना। भक्त को नहीं पता है कि उसके लिए क्या ठीक है, क्या नहीं। उसे यह सब गुरु पर ही छोड़ना है। फिर जो वो करे, उसी रज़ा में रहना है।
...तो अगली बार आपने उस माई को कहकर पुत्र दिया। पर उसे बता दिया कि भरोसा पक्का रखना।
माँ की तरह है आपका व्यवहार
अपने भक्तों से आप माँ की तरह व्यवहार करते हैं। जैसे माँ अपने बच्चे पर पूरा हक़ रखती है, ऐसे ही आप भी प्रत्येक नामी से हक़ से बात करते हैं। जैसे गलती होने पर माँ डाँटती है; उसे फ़िक्र रहती है कि उसका बेटा गलत न हो जाए, कहीं बुरी संगत में न फँस जाए, ऐसे ही आपको भी फिकर रहती है कि कहीं आपका नामी कहीं गलत तो नहीं चल रहा। यदि ऐसा है तो आप पूरे हक़ से उसे डाँट-फटकार कर सीधी राह पर लाते हैं। आपको हरेक की फ़िक्र रहती है। आपको हरेक