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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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निराले सद्गुरु <span style="float: right;">77</span>

का पता रहता है कि यह फलाना है, यह फलाना है। लाखों की संगत हो जाने पर भी आपको सबकी ख़बर है कि कौन क्या कर रहा है। फिर जैसे माँ का व्यवहार कोमल भी है; डाँटने के बाद अपने बच्चे को प्यार भी देती है। ऐसे ही आप भी प्यार देते हैं। फिर आपका प्यार पाकर वो डाँट भी भूल जाती है। कुछ तो चाहते हैं कि उन्हें डाँट पड़े, ताकि बाद में आपका बहुत सारा प्यार भी मिल सके। जैसे माँ के लिए सब बच्चे समान होते हैं, ऐसे ही आपके लिए भी सब समान हैं।

आपकी राह बड़ी कठिन है। कई समस्याएँ आपको सुननी पड़ती हैं। हररोज़ सैकड़ों लोग नयी-नयी समस्याएँ लेकर आते हैं। आप सबको सुनते हैं। फिर उसका हल भी बताते हैं, उन्हें संतुष्ट भी करते हैं। एक माई आई। उसके बेटे ने मोटर साइकिल पर एक्सीडेंट कर दिया था। लड़के का कंधा तोड़ दिया था। 4 महीने बाद घर में सम्मन आया। वकील किया तो वो 10 हज़ार रूपये माँग रहा था। माई ने कहा कि मैं ग़रीब हूँ; गाँव में मैं ही अकेली नामिन हूँ। अब आपको ऐसे लोगों की समस्या तो सुननी ही है, क्योंकि आप हैं ही ग़रीबों के। आपको ऐसे लोगों को तसल्ली देने के साथ-साथ ताक़त भी देनी पड़ती है ताकि दृढ़ रहें, घबराएँ नहीं।

आपको हर महीने अपने शिष्यों को दर्शन देने भी जाना पड़ता है। जहाँ-जहाँ भी आपके आश्रम हैं, वहाँ-वहाँ जाना पड़ता है। ग़रीब संगत होने से कुछ हर महीने नहीं आ पाते हैं। वे आपसे प्रार्थना करते हैं कि हर महीने दर्शन दिया करें। कभी आप कैंसल करने की सोचते हैं तो उनके चेहरे मुरझा जाते हैं। क्योंकि आपसे मिलने वाले उस अमृत को आपके नामी ही समझ पाते हैं। बाकी साधारण लोगों की बुद्धि से ये बातें बहुत परे की हैं। उनको ये बातें समझ में आने वाली नहीं हैं। क्योंकि उनके गुरु के पास यह अमृत नहीं है, जिसे लेने को वे बार-बार गुरु के पास पहुँचें। इसलिए तो वे कहते भी हैं कि क्या करना है बार-बार जाकर ! सीधा-सा मतलब है कि उन्होंने उस अमृत का कोई ज्ञान नहीं है,