निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
Page 78 of 112
Read in context78 <div style="text-align: right;">साहिब बन्दगी</div>
जो संत सद्गुरु और केवल संत सद्गुरु ही दे सकते हैं। ....तो आप एक माँ की तरह स्वयं ही उन्हें वो अमृत प्रदान करने हर महीने पहुँचते हैं। जैसे माँ को बच्चे की फ़िक्र रहती है कि कुछ खाया कि नहीं। ऐसे ही आपको भी फ़िक्र रहती है कि आप सबको अपनी सुरति दे पाएँ।
संगत का एक पैसा भी नहीं लेते हैं आप
आप घर बना रहे थे तो दो कमरे ही बना पाए कि पैसे नहीं रहे। तब आपने 75 हज़ार लोन लिया और घर बनवाया। संगत का एक रूपया भी आप अपने निजी इस्तेमाल के लिए नहीं लगाते हैं। आपको जो पैंशन मिलती है, उसी से अपना गुज़ारा करते हैं। केवल जो आप घूम-घूमकर हरेक आश्रम में जाते हैं, वो संगत का पैसा होता है। आपको साढ़े सात हज़ार रूपया पैंशन मिलती है, जिसमें से आप रोटी खाते हैं।
यदि आपने संगत के लिए हक़ की कमाई का नियम बनाया है तो सबसे पहले खुद भी इसका पालन करते हैं आप। जो भी नियम आप संगत को बताते हैं, सबसे पहले स्वयं उनपर चलते हैं। आप कहते हैं कि यदि मैं बेइमानी शुरू कर दूँगा तो आप सब भी बेइमान हो जायेंगे। यदि मैं हक़ की कमाई से नहीं खाऊँगा तो आप भी नहीं खा पायेंगे। क्योंकि नाम के बाद अब आप सबमें मेरे ही गुण तो आयेंगे। जो जिसकी सुरति करता है, उसी के ही तो गुण आते हैं। इसलिए मैं कहीं पर भी गलत चलने लगूँगा तो आप सबका सत्यानाश हो जायेगा, सब डूब जाओगे।
पर सत्य तो यह है कि आप किसी भी तरफ से गलत चल ही नहीं सकते हैं। यह तो समझाने का एक तरीका है। आपने कभी यह कहा ही नहीं कि आप ही सब कुछ हैं या आप ही सब कुछ कर रहे हैं। आपका बड़प्पन इसी में है कि अमर लोक के मालिक होकर आप संसार में सेवक बनकर रहते हैं। आप शुरू से ही सेवक बनकर जिए हैं। पहले माँ की सेवा, फिर गुरु जी की सेवा और देश की सेवा और फिर संगत की