निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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सेवा। सेवा ही आपको प्यारी है। आप स्वामी नहीं, बल्कि सेवक बनकर ही रहते हैं। तन-मन-धन और पूरा जीवन आपने सेवा में लगा दिया। आप फौज में जनरल नहीं थे, सूबेदार थे। करोड़ों की सम्पत्ति थी। पूरा जीवन गुरु-सेवा की, संगत की सेवा की। दो महीने छुट्टी पर आते थे तो उन महीनों का खर्चा आप ही करते थे। आपके पास नहीं होते तो उधार लेते। आप सोचते कि गुरु जी का खर्चा नहीं होने देना है। आपने कोई सरकारी फण्ड भी नहीं कटवाया, खाली हाथ रहे। रिर्टायर होने पर आपको 4 लाख मिले। अभी तो 15 लाख मिलते हैं सूबेदार को। आपने सोचा कि क्या करना है, 4 प्लॉट लिए-25-25 हज़ार के। अभी उनकी कीमत 15-15 लाख होगी। आपने अपनी कमाई से ही खाया; संगत के पैसे से चाय भी नहीं पीते हैं आप। बस, अपने को सेवक की तरह मानकर आप बढ़ते जा रहे हैं। कुछ भी अपने नाम नहीं रखा। फिर कोई अपने आप को ओसामा बिन लादेन बनाकर रखता है, कोई मजनू बनाकर रखता है। यह है दुनिया!
आपने कभी किसी से कुछ नहीं माँगा। करीब 150 आदमी को मकान बनाकर दिये। आप प्रेरित भी नहीं करते। एक माई ने आपको 10 हज़ार रुपये दिये, कहा कि मेरे पति के नाम पर पंखे लगा देना। आपने कहा कि फिर ले जा। यह दूसरे को प्रेरित करने वाली बात है ताकि दूसरा भी दे और चुपचाप अपना काम हो। आपने यह काम भी नहीं किया।
आप सौम्य हैं
आप सौम्य हैं; आप अत्यंत सौम्य हैं। आपकी वाणी बड़ी ही सौम्य है। कोई कितना भी सुने, अखरती नहीं है। आपका स्वभाव अत्यंत ही सौम्य है। किसी को भी अखरता नहीं है। आपका रोम-रोम सौम्य है। कोई आपको कितना भी देखता रहे, उसे अखरता नहीं है।