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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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80 | साहिब बन्दगी

सुलझावन हारी है आपकी वाणी

आपके शब्द कभी आपस में विपरीत दिशा में नहीं जाते हैं। वे एक ही लाइन पर होते हैं। और फिर जो बात आप आज कहेंगे, वही मानो 50 साल के बाद भी कहेंगे। कहीं भी आपकी वाणी में बदलाव नहीं मिलेगा। यानी आपकी हर बात में सत्यता है, इसलिए वो कभी बदलती नहीं। महात्मा लोगों को देखें तो वो उलझी हुई बातें कहते हैं। कुछ पहले शिवजी के जयकारे लगाते हैं, फिर अचानक विष्णु जी और फिर हनुमान जी के जयकारे शुरू हो जाते हैं। भक्त लोग उलझन में पड़ जाते हैं कि बाबा जी भक्त किसके हैं और हम किसकी भक्ति करें। कौन बड़ा है, यह समझ नहीं आता है। सच यह होता है बाबा जी खुद उलझे होते हैं, उन्हें खुद मालूम नहीं होता कि कौन बड़ा है, कौन छोटा। साहिब ने इस पर बड़ा प्यारा शब्द कहा है-

मैं कहता हूँ आँखिन देखी, तू कहता कागज की लेखी।
मैं कहता सुलझावन हारी, तू राख्यो उलझाई रे ॥..

कहने का भाव है कि जो खुद नहीं पहुँचा है, जो केवल कागज की लिखी बातें बोल रहा है, वो उलझाने वाली बात ही करेगा। किताबों में तो सबकी बात लिखी है। बस, महात्मा भी सबको महत्व दे रहे हैं। पर जो खुद किसी मुकाम पर पहुँचता है, वो उसी मुकाम की बात करता है और बड़े दावे से कहता है कि मैं वहाँ गया हूँ। फिर वो अपनी बात से पलटता भी नहीं है। क्योंकि उसने वो स्थान खुद देखा होता है। चाहे वो तीन लोक की सीमा में ही हो। कहने का भाव है कि महात्मा लोग आंतरिक दुनिया में बिलकुल भी नहीं गये होते हैं और केवल किताबों से पढ़कर ही दुनिया को उलझाया करते हैं। पर आपकी वाणी उलझाने वाली नहीं है। आप एक परम-पुरुष की भक्ति देते हैं। आपकी शरण में आने वाला इसलिए तो कहीं और भटकता नहीं है। क्योंकि उसे एक सही ठिकाना मिल जाता है। उसकी सब उलझने समास हो जाती हैं।