निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
Page 93 of 112
Read in contextनिराले सद्गुरु
93
किसी धर्म स्थान को नुक़सान नहीं पहुँचाया। यह सब आपकी प्लॉनिंग में नहीं है। जब आश्रमों को जलाकर भी जी नहीं भरा तो गुण्डों ने मिनिस्टर गुण्डों के साथ मिलकर रखबंधु आश्रम को तुड़वाने की प्लॉनिंग बना ली। रातों-रात आश्रम तोड़ने की योजना बन गयी, आर्डर भी पास करवा दिया। उस आश्रम की ज़मीन योगियों ने दान में दी थी। उसकी रिजिस्ट्री नहीं हुई थी। बस, पाखण्डियों को तो मौका ही चाहिए था। अब सवाल है कि किस मंदिर की रजिस्ट्री है! पहले वहाँ कारंवाही होनी चाहिए। दूसरे पंथों पर कारंवाही होनी चाहिए। साहिब बंदगी का तो 108 आश्रमों में से केवल वही आश्रम है, जिसकी रिजिस्ट्री नहीं है, बाकी की है। वो भी आपको दान में मिली है। कोई सरकारी भी नहीं है। बाकी पंथों की ज़मीनें तो सरकारी हैं, पर वहाँ कोई हाथ नहीं डालता है, क्योंकि वे राजनीति में हैं, मिनिस्टरों से मिली हुई हैं, उनसे जान-पहचान है। आप राजनीति में नहीं हैं। यही कारण है कि पाखण्डी सोचते हैं कि ये कुछ नहीं कर सकते हैं। पर उन्हें आपके सोटे का पता नहीं है। उन्हें नहीं मालूम है कि आपका अपराधी चाहे कहीं भी चला जाए, वो बच नहीं सकता है। तो आपने रात को आश्रम टूटने नहीं दिया, अंदर से ही उन्हें रोक दिया। आपने कहा कि सुबह तोड़ दें तो कोई बात नहीं है, फिर हम कानूनी कारंवाही कर लेंगे। तब तक आपने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री, उपआयुक्त (डेप्यूटी कमिश्नर)आदि तक लिखित संदेश भिजवा दिया कि हमारे साथ ऐसा-ऐसा होने जा रहा है। अब कुछ भी हो जाए, बिना किसी रोक के आप कानूनी कारंवाही के लिए तैयार हो गये। पाखण्डी कितनी भी घिनौनी हरकतें करते रहें, पर आपके काम शिष्ट ही रहे हैं। अब अखनूर हमले की बात क्या थी? मास्टर जी का वो दोहा था। आपने कहा भी था कि नहीं लिखो। पर दोहा ख़राब नहीं था। लोगों ने उसका अर्थ गलत लगाया। दोहा था-
निगुरा ब्राह्मण नहीं भला, गुरुमुख भला चमार।
देवतन से कुत्ता भला, नित उठ भूँके द्वार॥