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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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94 साहिब बन्दगी

इसका अर्थ तो यह है कि ब्राह्मण होकर निगुरा नहीं रहना चाहिए। जो ब्राह्मण होकर निगुरा रहता है, वो अच्छा नहीं है। फिर बीच में अल्प विराम है और उसके बाद कहा है कि यदि कोई चमार है और वो गुरुमुख है, तो वो अच्छा है। फिर दूसरी पंक्ति का अर्थ है कि देवतन यानी जो मिट्टी, पत्थर आदि के मोहरे हैं, उनसे तो कुत्ता अच्छा है। यदि कोई चोर घर आ जाए तो वो भौंकता तो है न, पर वो तो कोई रक्षा नहीं कर सकते हैं। देवतन कोई ब्रह्मा, विष्णु, महेश को नहीं बोला है। वो तो देवता हैं। लोगों को पता ही नहीं है। अर्थ नहीं समझा। फिर आपने हाई कोर्ट में हरिद्वार से छपी किताब भी दिखाई, जिसमें यह दोहा लिखा था। आबे-बाबाओं ने दोहे को तो बहाना बनाया। इससे पता चलता है कि हमारे धर्म में कितना पाखण्ड छिपा है। यह कितना खतरनाक काम किया और 5 हज़ार लोग झगड़ा करने आ गये। अगर एक इशारा आप कर देते तो सबकी बुरी हालत हो जाती। वो तो 10-20 लड़के जोश में आकर भागे। आपने तो मना किया। अगर नहीं करते तो कुछ और ही कहानी होती। पर आपके काम गुण्डों वाले नहीं हैं, संतों वाले हैं। सरकार ने भी किसी को नहीं पकड़ा, कोई कदम नहीं उठाया। आप निपटते तो हैं ऐसे लोगों से, पर अंदाज बड़ा प्यारा है आपका।

आपके ऐसे व्यवहार को देखते हुए ही तो आपको सन् 2002 के गाँधी पीस पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आपने हिंसा का जबाब हिंसा से नहीं दिया। किसी भी गुरु पर कोई उँगली उठाए तो संगत का दिल तार-तार हो जाता है; वो भड़क उठती है, कहीं रोड़ जाम तो कहीं खूनी खेल खेला जाता है। एक निंदा का शब्द भी कोई अपने गुरु के लिए सहन नहीं कर पाता है। आपकी इतनी निंदा हुई; लोगों ने जगह-जगह पुतले फूँके, हमले किये गये, मारने का प्रयास किया गया, पर कहीं भी आपने अपनी संगत को न तो रोड़ जाम करने दिये, न ही कोई हिंसात्मक कार्य करने दिया। संतों ने ये काम किये ही नहीं। संतों में सहनशीलता

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