निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
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आपने कोर्ट में अपील की। 10 साल हो गये; उनकी नानी की भी तौबा कर दी। 9 लोग थे। कुछ समय बाद उनमें से 3 लोग मर गये। जज रोने लगा, कहा कि तीन तो मर गये, बाकी को माफ़ करो। आपने कहा- नहीं, आप बरी करो, मैं हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में ले चलूँगा। दौड़ाऊँगा खूब, कुतुबमीनार, लाल किला सब दिखाना चाहता हूँ इनको।
पर आप मुकद्दमे लड़ने नहीं आए। किसी से झगड़ा करने नहीं आए। मुकद्दमा एक तरीका है, एक मजबूरी है, क्योंकि आप हिंसात्मक कार्यों से दूर रहते हैं। आसानी से आप मुकद्दमा नहीं करते, पर जब एक बार कर देते हैं तो फिर पीछे नहीं हटते, समझौता नहीं करते। हार जाना ठीक है, पर समझौता नहीं मंजूर है आपको। जिनपर आपने केस किये हैं, वे संदेश भिजवाते हैं, पर आप समझौता नहीं करते।
आप किसी को सताने नहीं आए। आपके लिए तो सब समान हैं; सब आपके हैं। आपकी लड़ाई झूठ के ख़िलाफ़ है, और बड़ी तगड़ी है। आपकी हर बात सच्ची है। ऐसे ही सत्य नहीं लिख रखा है।
पर आप एक तरीके से निपटते हैं। जब हमला हुआ था तो बाद में एक माई ने आपसे कहा-साहिब जी! कुछ करिए न। वो माई शायद चाहती थी कि आप अपना असली रूप दिखाएँ और हनुमान जी की तरह सब पाखण्डी रूपी राक्षसों को उठा-उठा कर फेंक दें.....कहीं दूर। यदि ऐसा काम किया तो राक्षसों वाला काम हुआ। पर आप संतों वाला काम करना चाहते हैं।
पाखण्डी तो लीडर बनने के लिए साहिब-बंदगी की ख़िलाफ़त करते हैं। एक नामी था, उसे लगा कि वो अब जाने वाला है। उसने घर वालों को कह दिया कि उसका अंतिम संस्कार साहिब-बंदगी के अनुसार करना। उसने गाँव वालों से भी कह दिया। जब उसका शरीर छूट गया तो कुछ लोगों ने बदमाशों से कह दिया कि इसका अंतिम संस्कार साहिब बंदगी के अनुसार नहीं होने देना है। बदमाशों ने आकर घर वालों