नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ नीतिवाक्यामृतम् स्वामी की कृपा का स्वरूप— किं तेन स्वामिप्रसादेन यो न पूरयत्याशाम् ॥ १३ ॥ स्वामी की उस प्रसन्नता से क्या लाभ जिससे आशा न पूर्ण हो । क्षुद्रमण्डल के दोष— क्षुद्रपरिषत्कः सर्पवानाश्रय इव न कस्यापि सेव्यः ॥ १३ ॥ जिसकी सभा में क्षुद्र पुरुष हों अर्थात् जिसके परामर्श दाताओं के मण्डल में क्षुद्र विचार के लोग होते हैं उसका उस स्वामी का आश्रय कोई भी उसी प्रकार नहीं ग्रहण करता जिस प्रकार सर्प से बसे हुए घर में कोई नहीं रहता । कृतघ्नता का दोष— अकृतज्ञस्य व्यसनेषु न सन्ति सहायाः ॥ १५ ॥ कृतघ्न पुरुष को दुःख पड़ने पर कोई सहायक नहीं होता । प्रत्येक व्यक्ति में विशेष गुण की आवश्यकता— अविशेषज्ञः शिष्टैर्नाश्रीयते ॥ १६ ॥ जिसमें कोई विशेष गुण नहीं होता शिष्ट पुरुष उसका आश्रय नहीं लेते । अतिस्वार्थ का दोष— आत्मम्भरिः कलत्रेणापि त्यज्यते ॥ १७ ॥ केवल अपना पेट भरना जाननेवाले को अर्थात् अत्यन्त स्वार्थी को उसकी स्त्री भी छोड़ देती है । उत्साह की महिमा— अनुत्साहः सर्वव्यसनानामागमद्वारम् ॥ १८ ॥ अनुत्साह सब प्रकार के दुःखों के आने का द्वार है । अर्थात् जहां उत्साह नहीं वहां अनेक आपत्तियां आती रहती हैं । उत्साह के गुण— शौर्यममर्षः शीघ्रकारिता सत्कर्मप्रवीणत्वमित्युत्साहगुणाः ॥ १६ ॥ पराक्रम, अन्यायी पर क्रोध और कार्यों को शीघ्र करना तथा सत्कर्म में कुशल होना ये उत्साह के गुण हैं । अन्यायाचरण का दोष— अन्यायप्रवृत्तेर्न चिरं सम्पदो भवन्ति ॥ २० ॥ अन्यायाचरण करनेवाली की सम्पत्ति चिरस्थायी नहीं होती । स्वेच्छाचार का दोष— यत्किंचनकारी स्वैः परैर्वा हन्यते ॥ २१ ॥