नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमात्यसमुद्देशः ६३ अनुपयोगिना महतापि किं जलधिजलेन ॥ ६७ ॥ समुद्र की उस विशाल जलराशि से क्या लाभ है जो खारी होने के कारण उपयोग में नहीं आ सकती। [ इति स्वामिसमुद्देशः ] १८. अमात्यसमुद्देशः अमात्य पद की महत्ता— चतुरङ्गयुतोऽपि नानमात्यो राजास्ति कि पुनरन्यः ॥ १ ॥ हाथी, घोड़े, रथ और पैदल की चतुरङ्गिणी सेना से युक्त भी राजा बिना अमात्य के अपना अस्तित्व स्थिर नहीं रख सकता फिर अन्य के विषय में क्या कहा जाय ? नैकस्य कार्यसिद्धिरस्ति ॥ २ ॥ अकेले राजा को कार्यसिद्धि नहीं हो सकती। नह्येकचक्रं परिभ्रमति ॥ ३ ॥ रथ का अकेला पहिया नहीं घूमता। किमवातः सेन्धनोऽपि वह्निर्ज्वलति ॥ ४ ॥ क्या बिना वायु के लकड़ी से युक्त भी आग कहीं जलती है ? अमात्य का स्वरूप— स्वकर्मोत्कर्षापकर्षयोर्दानमानाभ्यां सम्पत्तिविपत्ती येषां तेऽमा- त्याः ॥ ५ ॥ अपने कर्म के अनुसार उन्नति और अवनति के अवसर पर राजा के द्वारा प्रदत्त दान-मानादि से जिनको हर्ष और विषाद हो वे अमात्य हैं। अमात्य के मुख्य कर्तव्य— आयो व्ययः स्वामिरक्षा-तन्त्रपोषणं चामात्यानामधिकारः ॥ ६ ॥ आय और व्यय की देखभाल, राजा की सुरक्षा तथा सैन्य शक्ति का संरक्षण और पोषण ये चार अमात्य के मुख्य कर्त्तव्य हैं। आय-व्यय विषय का विचार— आयव्ययमुखयोर्मुनिकमण्डलुनिदर्शनमेव ॥ ७ ॥ आय और व्यय के विषय में मुनि का कमण्डलु दृष्टान्त रूप है। कमण्डलु में ऊपरी मुख चौड़ा और बड़ा होता है जिससे जल जल्दी भर जाता है और जल गिराने की टोंटी का मुख छोटा होता है जिससे गिराने में जल धीरे-धीरे