भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

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सदाचारसमुद्देशः १४३ जो परम्परा से प्राप्त बैरभाव को शान्त नहीं कर सकता उसके वंश का विस्तार कैसे हो सकता है ? अर्थात् किसी से पुराना बैर ठना रहने पर अवश्य ही कभी न कभी मारपीट में कुछ आदमी मरेंगे और इस प्रकार वंश की वृद्धि में बाधा होगी अतः वैर मिटा दे । भीतेष्वभयदानात् परं न दानमस्ति ॥ १७ ॥ डरे हुये को अभयदान देने से बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ दान नहीं है । स्वस्यासम्पत्तौ न चिन्ता किञ्चित् काङ्क्षितमर्थं ( प्रसूते ) दुग्धे किन्तूत्साहः ॥ १८ ॥ अपनी दरिद्रता के विषय में चिन्ता में पड़े रहने से कोई लाभ नहीं होता किन्तु उत्साह रखने से अच्छा फल मिलता है। अर्थात् उत्साहपूर्वक उद्योग करने से लक्ष्मी अवश्य प्राप्त होती हैं। स खलु स्वस्यैवापुण्योदयोऽपराधो वा (यः) सर्वेषु कल्पफलप्रदोऽपि स्वामी भवत्यात्मनि वन्ध्यः ॥ १६ ॥ यदि कोई स्वामी सर्वसाधारण के लिये कल्पवृक्ष के तुल्य फलदायक हो किन्तु मात्र अपने को उससे कोई फल न मिल सके तो उसे अपने ही पापों का उदय अथवा अपना ही कोई अपराध समझना चाहिए। स सदैव दुःखितो यो मूलधनमसंवर्धयन्ननुभवति ॥ २० ॥ वह व्यक्ति सदा ही दुखी बना रहता है जो मूल धन का उपयोग करता है। मूर्खदुर्जनचण्डालपतितैः सह संगतिं न कुर्यात् ॥ २१ ॥ मूर्ख, दुर्जन, चण्डाल और पतित पुरुषों की संगति न करे। किं तेन तुष्टेन यस्य हरिद्राराग इव चित्तानुरागः ॥ २२ ॥ जिसका प्रेम हलदी के रंग के समान धो देने से छूट जानेवाला हो अर्थात् थोड़े में ही बदल जानेवाला हो उस मनुष्य के सन्तुष्ट हो जाने से भी क्या लाभ होगा ? वह क्षणभर में फिर बदलकर अहित भी कर सकता है। स्वात्मानमविज्ञाय पराक्रमः कस्य न परिभवं करोति ॥ २३ ॥ अपनी शक्ति और सामर्थ्य का अनुमान किये बिना दूसरे पर आक्रमण करने से किसकी पराजय नहीं होगी ? नाक्रान्तिः पराभियोगस्योत्तरं किन्तु युक्तेरुपन्यासः ॥ २४ ॥ शत्रु के आक्रमण का वास्तविक उत्तर स्वयं भी आक्रमण कर देना नहीं होता, किन्तु युक्ति से कोई बात करना ही उसका वास्तविक उत्तर होता है। राज्ञोऽस्थाने कुपितस्य कुतः परिजनः ॥ २५ ॥