भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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त्रयीसमुद्देशः ३५ ब्राह्मण आदि के स्वाभाविक धर्मों का वर्णन — दीना प्रकृतिः प्रायेण ब्राह्मणानाम् ॥ ३१ ॥ ब्राह्मणों का स्वभाव प्रायः दीन-अर्थात् विनम्र होता है। बलात्कारस्वभावः क्षत्रियाणाम् ॥ ३२ ॥ क्षत्रियों का स्वभाव बलात्कार-बल प्रदर्शन होता है। निसर्गतः शाठ्यं किरातानाम् ॥ ३३ ॥ कोल, भील आदि स्वभावतः शठ होते हैं। ऋजुवक्रशीलता सहजा कृषीवलानाम् ॥ ३४ ॥ किसानों में स्वाभाविक नम्रता और स्वाभाविक कठोरता भी होती है। दानावसानः कोपो ब्राह्मणानाम् ॥ ३५ ॥ ब्राह्मणों के क्रोध का अन्त दान में होता है अर्थात् दान पाने से ब्राह्मण सन्तुष्ट हो जाता है। प्रणामावसानः कोपो गुरूणाम् ॥ ३६ ॥ गुरुओं के क्रोध का अन्त प्रणाम करने से होता है। प्राणावसानः कोपः क्षत्रियाणाम् ॥ ३७ ॥ क्षत्रियों के क्रोध का अन्त प्राण लेकर ही होता है। प्रियवचनावसानः कोपो वणिग् जनानाम् ॥ ३८ ॥ वैश्यों के क्रोध की शान्ति मीठे वचनों से होती है। वैश्यानां समुद्धारप्रदानेन कोपोपशमः ॥ ३६ ॥ वैश्यों के क्रोध की शान्ति उनका कर्ज चुका देने से हो जाती है। निश्चितैः परिचितैश्च सह व्यवहारो वणिजां निधिः ॥ ४० ॥ जो स्थायी रूप से एक जगह रहते हों और भली भांति परिचित हों उन के संग लेन-देन का व्यवहार करना वैश्यों के लिये 'निधि' रूप है। क्योंकि इनको दिये गये ऋण के न वसूल हो सकने का भय नहीं रहता और वैश्यों की ऐश्वर्य-वृद्धि होती हैं। दण्डभयोपधिभिर्वशीकरणं नीचजात्यानाम् ॥ ४१ ॥ दण्ड-भय और छल-छद्म पूर्ण व्यवहार नीच जाति के लोगों को वश में करने का उपाय है। इति त्रयी समुद्देशः ॥