न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० अप्रत्यक्षत्वाच्चेति । यथेतरेतरविधर्माणो रूपादयो न द्वैविध्यमतिवर्तन्ते, तथा रूपादिदैधर्म्याच्चेतना न द्वैविध्यमतिवर्तेत यदि शरीरगुणः स्यादिति ! अतिवर्तते तु, तस्मान्न शरीरगुण इति । भूतेन्द्रियमनसां ज्ञानप्रतिषेधात् सिद्धे सत्यारम्भो विशेषज्ञापनार्थः । बहुधा परीक्ष्यमाणं तत्त्वं सुनिश्चिततरं भवतीति ॥ ५५ ॥ मनःपरीक्षाप्रकरणम् [ ५६-५९ ] परीक्षिता बुद्धिः, मनसः इदानीं परीक्षाक्रमः । तत् किं प्रतिशरीरमेकम्, अनेकं वा ? इति विचारे— ज्ञानायौगपद्यादेकं मनः ॥ ५६ ॥ अस्ति खलु वै ज्ञानायौगपद्यमेकैकस्येन्द्रियस्य यथाविषयम्, करणस्यैकप्रयत्न- निर्वृत्तौ सामर्थ्यान्न तदेकत्वे मनसो लिङ्गम् । यत्तु खल्विदमिन्द्रियान्तराणां विषयान्तरेषु ज्ञानायौगपद्यमिति तल्लिङ्गम् । कस्मात् ? सम्भवति खलु वै बहुषु मनःस्विन्द्रियनःसंयोगयौगपद्यमिति ज्ञानयौगपद्यं स्यात्, न तु भवति । तस्माद्विषये प्रत्ययपर्यायादेकं मनः ॥ ५६ ॥ अप्रत्यक्ष होने से भी । जैसे रूपादि इतरेतरविधर्मी होते हुए भी मुख्य अंश में समानधर्मा ही हैं, क्योंकि पूर्वोक्त (३. २. ५३) द्वैविध्य (अप्रत्यक्षत्व व बहिरिन्द्रिय- ग्राह्यत्व) को वे अतिक्रान्त नहीं करते । उसी तरह चेतना भी यदि शरीर-गुण होती तो उक्त द्वैविध्य को अतिक्रान्त न करती ! जब कि वह अतिक्रान्त करती है, अतः यह सिद्ध है कि वह शरीरगुण नहीं, अपितु द्रव्यान्तरगुण है । भूत, इन्द्रिय तथा मन में ज्ञान का प्रतिषेध हम पीछे (३. २. ३८) कर आये, यों सिद्ध होने पर भी विशेष ज्ञान के लिये फिर से बात को उठाया गया; क्योंकि अनेक तरह से परीक्षित तत्त्व ही सुनिश्चित हुआ करता है ॥ ५५ ॥ बुद्धि की परीक्षा हो चुकी, अब मन की परीक्षा का उपक्रम कर रहे हैं। वह मन प्रत्येक शरीर में एक है, या अनेक ? —ऐसा विचार (संशय) उपस्थित होने पर, कहते हैं— ज्ञानायौगद्य हेतु से मन एक ही है ॥ ५६ ॥ ज्ञान युगपत् उत्पन्न नहीं होते, अपितु क्रमिक ही होते हैं । प्रत्येक इन्द्रिय स्वस्व- विषयक ज्ञान कराने में नियत है, अर्थात् उस-उस इन्द्रिय का एक काल में स्वस्वविषयक एक ही ज्ञान कराने में सामर्थ्य देखा जाता है—ऐसा एकत्व मन की सिद्धि में हेतु नहीं; बल्कि दूसरी इन्द्रियों के विषयान्तरों का ज्ञानायौगपद्य (एक ही ज्ञान) मन की सिद्धि में हेतु है; क्योंकि अनेक मन मानने पर दूसरी इन्द्रियों के साथ भी मनःसंयोग होने से इन्द्रियान्तरज युगपत् अनेक ज्ञान होने लगेंगे । ऐसा होता है नहीं, अतः उस उस विषय का तत्तदिन्द्रियों द्वारा एक ज्ञान होने से 'मन' सिद्ध हो जाता है ॥ ५६ ॥