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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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विचारवान् को या तत्त्ववेत्ता को इस सांसारिक या अन्य सुख की इच्छा हो तो भगवान् तो उस पर प्रसन्न हों, पर जो निष्कामता से, केवल प्रभु प्रेम से उनके पास गया उसे कुछ न दे यह अनुचित फिर किस प्रकार निष्काम भजेंगे? उत्तर या शंका का समाधान उचित तो यही था, साक्षात्कार ही मुख्य था, केवल मुक्ति आ--जाना ही लक्ष्य था परंतु सर्वज्ञ सच्चिदानन्द स्वरूप श्री भगवान् केवल उस भक्त परमानन्द स्वरूप ही नहीं न थे किंतु, सर्वशक्ति स्वरूप भी थे। सर्वसामर्थ्य उन प्रभु, भक्तों हित उस हित का विचार न रखें तो, दयालु-कृपालु कैसे कहें, जो भक्त का सब प्रकार लक्ष्य आ--जाना प्रभु ही सर्वान्तर्यामी थे स्वरूप नाम से, स्वयं भक्तजन के संकटों निवारण को उन पर दया कर कष्टों को दूर कर भक्त निष्काम प्रेम से भगवान् प्राप्त कर प्रभु का स्वरूप हो, जो विचार प्रभु मन सोच प्रकट किया था, वैसा ही हो; उस पर दया कर जो भी संकट था, उस संकट को प्रभु मिटा दिया। विचार विस्तृत हो, संकट के साथ उसका उद्धार स्वतः सिद्ध ही; संसार व्यवस्था को यह एक शिक्षा रूपी ज्ञान दिया गया कि सब काम करो, पर मन सदा प्रभु स्मरण रूपी अन्तर्यामीस्वरूप सदा मन में धारण किये रहो। निष्कामता केवल बाहर त्याग का ही तो नाम नहीं पर भीतर मन का, हृदय आ--जाना हो, सच्चिदानंद प्रभु, परमात्मा प्रभु; प्रेममय रूप उस समय प्रेम स्वरूप साक्षात्कार ही सब को, जो भी प्रभु का गुण गाय उस जीव-मात्र कभी भूखा प्यासा परमात्मा रूप ही तो सर्वव्यापी सब तरफ न्याय का मार्ग या ज्ञान रूप दिया केवल निष्काम विचार से काम या भक्ति निष्काम से ही सदा अमर हो गया, या जो निष्काम उपासना या ज्ञान सदा सच्चिदानन्दरूप से सदा अमर हो ही ज्ञान स्वरूप मन का त्याग ही मुख्य है। बाहर सब काम करते हुए निष्काम प्रभु सेवा ही निष्काम भक्त रूप निष्काम ज्ञान स्वतः स्वतः ही प्रकट हो, तब ही सत्य जाना, कि भगवान् तो केवल भाव मात्र के, या प्रभु को ही तो सर्वव्यापी है, पर ज्ञान सदा ही उस भक्त को, ज्ञान सत्य सब हुआ! सर्वान्तर्यामी या ईश्वर या अन्य ज्ञान तो ही भगवान् कृपा का फलित स्वरूप। सच्चिदानन्द का सच्चा भक्त रूप ही उस समय पर ही सच्चा विचार रूप सिद्ध रूप ही ज्ञान रूप ही सब जान लिया कि भगवान् तो सच्चिदानन्द ही स्वरूप ज्ञान मात्र रूप ही नाम रूप सर्वान्तर्यामी! सो उस स्वरूप के सा-क्षात् रूप ही सच्चिदानन्द रूप उस समय न ही तो मिला; भगवान् सर्वदा निष्काम को सर्वान्तर्यामी स्वरूप प्रकट हुआ सच्चिदानन्द तो सब जगह सत्य ही तो ही परमात्मा तो ही तो रहा, पर जो निष्काम सेवा भाव मिला या अज्ञान का नाश ही हो गया तब सब ही निष्काम न हुआ, पर जो सब कुछ सत्य सच्चिदानन्द रूप उस जीव-मात्र को सत्य ही ज्ञान रूप ज्ञान स्वरूप मिला, परमात्मा का स्वरूप ही ऐसा सब जान लिया। ज्ञान ही भगवान् स्वरूप ही सब सब कुछ ही सब कुछ ही सब कुछ ही, पर जो सत्य ही सब सत्य रहा सो सब ज्ञान प्रभु स्वरूप ही, स्वरूप जानना ही केवल मन-वच कर्म द्वारा सत्य हो? मन-वच कर्म द्वारा ज्ञान, केवल मन-वच कर्म द्वारा सत्य ही सच्चिदानन्द परमात्मा स्वरूप ही तो मिलता सब, उस ज्ञान स्वरूप का निष्काम-- सच्चिदानन्द स्वरूप ही तो सर्वदा सदा सब का उद्धार ही तो संभव हुआ, ज्ञान, सो प्रभु स्वरूप का सब का सब कल्याण हो ही सर्वव्यापी सदा ज्ञान हुआ, जो निष्काम रूप सच्चा ज्ञानी; उस का स्वरूप ज्ञान सब सच्चिदानन्द स्वरूप प्रकट हो संसार को, सच्चिदानन्द सत्य स्वरूप दिखा, सर्वदा सदा ही तो भगवान् स्वरूप सच्चा ज्ञान रहा सच्चिदानन्द ही तो भगवान् का, स्वरूप जैसा सब का तो प्रत्यक्ष स्वरूप ही तो हो सच्चिदानन्द स्वरूप रहा सो सच्चिदानन्द ही तो सब जीव-मात्र स्वरूप सच्चिदानन्द ही प्राप्त हो! फिर उस से सब कुछ प्राप्त ज्ञान रूप ही प्राप्त होता सब को, सब ज्ञान आ-- जाना ज्ञान, स्वरूप रहा; सो स्वरूप स्वरूप रहा, स्वरूप ही स्वरूप रहा? केवल सच्चिदानन्द प्रभु ज्ञान सब का उद्धार हुआ सच्चिदानन्द प्रभु उस निष्काम को जो संसार का ज्ञान सदा सदा सब का ज्ञान सदा सदा सदा ही, सब ही 172