अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 19, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस बात का पता था, लेकिन परिस्थितिवश उन्होंने अपनी मानसिक व्यथा किसी बच्चे अथवा बन्धु-बान्धव, किसी सहृदय साथी व मित्र, या फिर अन्य किसी व्यक्ति आगे प्रकट नहीं, कभी इस बात का अहसास कराया गया, अकारण ही उन सबको समाज विरोधी किसी भी रूप में तय नहीं, अलबत्ता जो व्यक्ति या समूह इस कार्यकलाप विरोधी था उसकी मंशा जरूर संशय उत्पन्न करनेवाली स्थिति पैदा करती, परिस्थितिवश समाजकंटकों द्वारा समाज की इस विधा शाखा तथा या अन्य को; जिसे समाज तथा समय ने, सही रूप से उचित तथा उपयोगी ही नहीं माना वरन् सब को उचित भी माना गया, समाज का बहुसंख्यक या सम्प्रदाय वर्ग; अधिकांश जन-साधारण-समूह इसे सही ठहरा, समाज हितकारी कार्य मानकर ही इसकी सराहना की! ऐसे ही कुछ जन समाज के ही लोग विपरीत धारणा रखते थे अथवा वे समाज का अहितकर रूप ही मान रहे थे जिनको कभी भी समाज का सिरमौर कहा, नहीं कहा जा सकता था लेकिन वे जनहित तथा समाज हित सम्बन्धी, यद्यपि कोई महत्वपूर्ण, उपयोगी काम नहीं करते; अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिए बिना भी समाज में नहीं रह पाते, या रह ही नहीं सकते थे। समाज हमेशा कुछ भिन्न-भिन्न प्रकार की धारणा रखने वालों से युक्त रहा, कभी-कभी तो जनहित कार्य का भी विरोध समाज के कुछ लोग अपने स्वार्थ की वजह से करने लगते, सम्भवतः यह, काम भी कुछ ऐसा समाज विरोधी समूह द्वारा किया जाता रहा जिसे समाज की यह उच्च सोच तथा कार्य का यह स्तर बिल्कुल पसन्द न आ रहा था या वे ऐसा नहीं होने देना चाहते थे कि उन पर इस तरह के कार्य कोई प्रभाव पड़े व उन पर कोई संकट आये। "खैर, जो सम्भव हुआ उसे होने दिया जाए ताकि आगे ऐसा काम कोई न कर सके या फिर आगे चल, कर वह इसके आगे न बढ़ सके।" सर्वसम्मति अपने पक्ष में कर लेने के लिए वह कुछ भी करने को हर हाल में जो तैयार हो चुका व्यक्ति या समूह कुछ समय इधर-उधर करने के पश्चात्-पश्चात् जब सफल न हुआ होगा तब ही समाज तथा सब कुछ अपने पक्ष में करना चाहेगा, तब ही व्यक्तिगत रूप उसने अपनी चाल-ढाल-चरित्र उजागर करना शुरू किया होगा। खैर, यह निष्कर्ष अब तक के विचार विमर्श द्वारा स्पष्ट हुआ। समाज का एक बड़ा प्रभावशाली वर्ग इस प्रकार केवल अविश्वास--की भावना तथा भ्रम का वातावरण ही, जन्म दे रहा था, परिस्थितिवश इस प्रकार समाज का एक नुकसान किया जा रहा था जिसकी भरपाई का कोई दूसरा मार्ग नहीं था या हो सकता था वह सब कुछ केवल, सोच-विचार तक ही रहा, ताकि समस्या का कोई समाधान या हल निकालने का रास्ता सम्भव हो सके। उसने सोचा समाज कल्याण सम्बन्धी कोई बात बने, जब तक समाज के लोग सही मानसिकता तथा सोच का साथ नहीं देंगे इसके साथ सहयोग नहीं देंगे तब तक समस्या बना रहना तय--था या हो जाना तय था फिर तो इस तरह समाज का कोई भी भला अथवा इस प्रकार समाज का तो कोई भला न होगा।" समस्या का हल न हो सके समाज के सभी सदस्य या बहुसंख्यक प्रभावशाली वर्ग को कोई भी ऐसा कदम उठाने से पूर्व सोचना होगा "समस्या का कोई कारण खोज निकाला जाना चाहिए, तब कहीं जाकर इसका हल निकल सकेगा" ऐसा उसने कुछ समय के उपरान्त ही सोचा, ताकि समस्या निवारण सम्बन्धी कोई ठोस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके जिसका प्रभाव बहुसंख्यक जन तक पड़े! एक विवशता उजागर हो रही बिना किसी बात के; जो हो रहा उसे होने का कोई औचित्य--या तो नहीं होगा या फिर जो कुछ हो रहा केवल दो जन ही जान रहे एक विवशता उजागर हो रही उस पर कुछ कहा जाना तो सम्भव हो नहीं रहा होगा जिस प्रकार सब कुछ था, खैर; देखना आगे क्या कुछ होता है, तो; इस बात का पता बाद चल सकेगा एक विवशता उजागर हो रही बहुसंख्यक जन तक इसका कोई प्रभाव न होने के कारण इसे बहुत ही सहज रूप, लिया जा रहा था जिसे आगे चलकर घातक रूप धारण कर लेना चाहिए जिसे केवल अपनी व्यथा कहा जाना था। स्वयं समाप्त हो सकता था, कोई दूसरा इसका लाभ, उठाये अथवा इसका उपयोग कर ले नहीं कह 19