पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्रदीपप्रकरणम् १२९ नाप्रतीति स्तयोर्बाधः किन्तु मिथ्यात्वनिश्चयः । नो चेत् सुपुप्तिमूर्च्छादौ मुच्येतायततो जनः ॥१३॥ जीव और जगत् की प्रतीति के बन्द हो जाने को हम उनका 'बाध' नहीं कहते हैं। किन्तु उन दोनों के मिथ्याभाव का निश्चय कर लेना ही हमारे मत में 'बाध' कहाता है। यदि तो प्रतीति न होने को ही बाध कहते हों तब तो सुपुप्ति या मूर्च्छा आदि के समय [ जब कि स्वतः ही द्वैत की प्रतीति नहीं होती ] तब बिना ही यत्न किये [ तत्त्वज्ञान का सम्पादन बिना किये ही ] मनुष्य मुक्त हो जाया करें । परमात्मावशेषोऽपि तत्सत्यत्वविनिश्चयः । न जगद्विस्मृतिर्नो चेज्जीवन्मुक्तिर्न संभवेत् ॥१४॥ पिछले बारहवें श्लोक में जो कि 'स्वात्मैव शिष्यते' कहा गया है उस स्वात्ममात्र शेष रहजाने का मतलब भी केवल उसी को सत्य समझ लेने से ही है। 'परमात्मा से भिन्न सब जगत् को भूल जाना उसका मतलब कदापि नहीं है। यदि स्वात्ममात्र शेष रह जाने का अभिप्राय जगद्विस्मरण से हो तब तो जीवन्- मुक्ति कोई चीज ही न रहे । [ जीवन्मुक्ति का मतलब यही है कि—संसार की खटपट में भी बुद्धि स्थिर रह सके । गम्भीर से गम्भीर और उत्तेजक से उत्तेजक अवस्था में भी परमात्म- तत्व को याद रखते हुए उस पर मजबूत दृष्टि जमाये हुए संसार की यात्रा की जाय ] परोक्षा चापरोक्षेति विद्या द्वेधा विचारजा । तत्रापरोक्षविद्यासौ विचारोऽयं समाप्यते ॥१५॥