पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 619, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहावाक्यविवेक का संक्षेप ३१
'अहं ब्रह्मास्मि' यह महामन्त्र समाया हुआ है। मौत ने सारे संसार को अपने जबड़े में दबा रक्खा है परन्तु उस मौत को भी निगल जानेवाला यह अन्दर का 'अहं ब्रह्मास्मि' कभी मरना जानता ही नहीं। इस अन्दर के 'अहं ब्रह्मास्मि' को इस मांस की चादर ने लपेट रक्खा है। अब तो हमें क्षुद्र देहाभिमान के रूप में इस 'अहं ब्रह्मास्मि' की निर्बल (मुरदा) आवाज़ कभी कभी सुनाई पड़ जाती है। अब इसमें ब्राह्मतेज नहीं रह गया है। अन्दर के इस 'अहं ब्रह्मास्मि' को—सोये पड़े हुए इस ओम् को— हम साधकों को धीरतापूर्वक जगाना पड़ेगा। जब यह पूरा पूरा जाग उठेगा और इस मांस की चादर को तोड़ फोड़ डालेगा, तब यह देहाभिमान को, किंवा क्षुद्र अहंकार को जलाकर राख कर देगा। देहाभिमान के जलने का बहाना पाकर यहीं 'अहं ब्रह्मास्मि' फिर ब्रह्माण्ड भर में फैल जायगा और इस अनन्त ब्रह्माण्ड पर फिर अपना एकछत्र आधिपत्य जमा लेगा। ऐसी दिव्य अवस्था जब आ जाती है तब ही 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि महावाक्यों के बोलने का सच्चा अधिकार प्राप्त होता है। नहीं तो कोरे शाब्दिक [शास्त्रीय] ज्ञान से कुछ भी होने जाने वाला नहीं है। गुड़ कहने मात्र से किसी का मुँह मीठा नहीं हो जाता है—राम राम रटने से तोता मुनि नहीं हो जाता है। ऐसी दिव्य अवस्था जब आती है तब शान्ति का अनन्त समुद्र उमड़ पड़ता है। तब शोक भय दीनता आदि ठहर नहीं पाते हैं। जिन लोगों के पवित्र मानस में इस तरह के अपौरुषेय महावाक्य सुनाई पड़ने लगते हैं, जिनके हृदय में पूर्णता की गुंजार रहने लग जाती है, वे ही मुनि हैं, वे ही जीवन्मुक्त हैं, उनको ही विदेह मुक्ति मिल सकती है। जिसकी वाणी के पीछे अनुभव का बल नहीं