भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 622, कुल 726 में से

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३४ पंचदशी में से निकल कर बार बार बाहर बैठने लगता है, तब उस साधक को ही हम अहम् ['मैं'] कहना चाहते हैं। देश काल या वस्तु के परिच्छेद में न आने वाली स्वभाव से ही परिपूर्ण जो वस्तु है वह 'ब्रह्म' कही जाती है। इस 'मैं' को और उस 'ब्रह्म' को परस्पर एक बता देना 'अस्मि' इस तीसरे पद का काम है। जिसका भाव यही होता है कि मैं (साधक) ब्रह्मतत्व ही हूँ अथवा मैं साधक ही तो ब्रह्म हूँ। अविद्या के प्रताप से जो मैं अपने आप को संसारी आदि मान बैठा था वह कुछ भी मैं नहीं हूँ। देहेन्द्रि- यादि की क्षुद्र और संकीर्ण दृष्टि में उलझा रह जाने वाला, देहेन्द्रियादि के साथ जल मरने वाला क्षुद्र प्राणी मैं कदापि नहीं हूँ। अथवा अविद्या के प्रताप से जो मैं ब्रह्मतत्व को अपने से पृथक्—सातवें आसमान पर रहने वाला—तत्त्व मान बैठा था वह ब्रह्मतत्व मुझ से पृथक् पदार्थ नहीं है। तत्त्वमसि जो अभी तक वृथा ही [नामालूम क्यों] शरीरों के वेष्टनों से लिपटा पड़ा था, जो शरीरों के साथ वृथा ही बार बार मर और जी रहा था, श्रवणादि का अनुष्ठान करके महावाक्य के समझने की योग्यता अब जिसमें आ गयी है, जो तीनों देहों से अलग रहने लगा है, जो तीनों देहों के साक्षी की हैसियत में आ गया है, उसी को हम लक्षणावृत्ति से 'त्वं' अर्थात् 'तू' कह रहे हैं। सृष्टि बनने से पहले सम्पूर्ण भेदों से रहित जो एक नामरूप रहित वस्तु थी, सृष्टि बन जाने के बाद अब भी जो वस्तु वैसी की वैसी ही है, जिस सद्वस्तु में अब भी कोई विकार नहीं आया है, उसी निर्विकार सद्वस्तु को हम लक्षणावृत्ति से 'तत्' अर्थात् 'वह' कह रहे हैं। इन दोनों शब्दों के लक्ष्यार्थों की जो छिपी हुई एकता है