भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 675, कुल 726 में से

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[११] ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप इस प्रकरण में उस ब्रह्मानन्द का वर्णन किया गया है जिसे पहचानते ही इस लोक और परलोक के त्रिविध ताप कूच कर जाते हैं और पहचानने वाला सुखरूप ब्रह्मतत्व ही हो जाता है। इस ब्रह्मज्ञान की श्रुतियों ने बड़ी प्रशंसा की है। वे कहती हैं कि—"ब्रह्मदर्शी पुरुष पर को पा लेता है। आत्मज्ञानी शोक मोह की हालत से ऊपर उठ जाता है। रस अथवा सार तो ब्रह्म ही है। इस रस को पाकर ही आनन्दी हो सकता है और तरह से नहीं। जब अपने रूप में प्रतिष्ठा (ठहरना) मिल जाती है तभी पुरुष अभय हो सकता है। जब तो अपने में भेद देखने लगता है तब उसे डरना ही पड़ता है। यह समझ लेने वाला पुरुष कि 'आनंद तो जहां भी है वहां ब्रह्मतत्व का ही है,' किसी भी बात और किसी भी घटना से नहीं डरता। कर्मरूपी अग्नि की चिन्ता बस एक इस ज्ञानी को ही छोड़ती है। शेष तो सब प्राणी इस कर्तव्याग्नि की ज्वालाओं से झुलसे पड़े हैं और इसी के झूठे इलाज करने में व्यग्र हो रहे हैं। ऐसा जान चुकने वाला पुरुष पाप पुण्यों को छोड़कर सदा आत्मा को याद रखने लगता है और किये हुए धर्मों को भी तो आत्मरूप ही जान लेता है। उस परावर को देख चुकने पर इसकी 'हृदयग्रन्थि' खुल जाती है। इसके सब सन्देह मिट जाते हैं और सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। उसी को जान चुकने वाला पुरुष जन्म मरणरूपी चक्कर से छूट सकता है। इस चक्र