पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 687, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९९ से हीन हो जाता है तब उसे 'शुद्ध मन' कहते हैं । मनुष्यों के बन्ध और मोक्ष का कारण यह मन ही है । विषयों में आसक्त मन मनुष्य को बँधवा देता है । निर्विषय बने हुए मन से मनुष्य को मुक्ति मिल जाती है । जिस चित्त को आत्मा में लगा दिया जाता है, जिस चित्त के रजस्तमोमल समाधिरूपी जल से धो दिये जाते हैं, उस चित्त को समाधि में जो आनन्द आता है, उसका वर्णन वाणी से किया ही नहीं जा सकता । क्योंकि वह तो एक अलौकिक ही सुख है । वाणी आदि लौकिक साधन उसे कैसे दिखा सकेंगे ? उसे तो मौन की अमानवी भाषा में ही समझना होगा । वह स्वरूपभूत सुख तो अन्तःकरण से ही ग्रहण किया जा सकता है । यद्यपि हरएक साधक मन को चिरकाल तक आत्मा में स्थिर नहीं कर सकता, फिर भी यदि किसी को क्षणभर की समाधि भी होने लगे तो उसे अगाध ब्रह्मानन्द समुद्र का निश्चय तो हो ही जाता है । जो श्रद्धालु हैं, जिन्हें इसकी चाट लग जाती है, उन्हें तो इसका निश्चय होकर ही रहता है । एक बार जब उन्हें निश्चय हो जाता है तब फिर वे सदा ही उस पर विश्वास किये रहते हैं । जिनको एक बार भी इस तत्व का निश्चय हो जाता है वे लोग उदासीनता के समय आने वाली आनन्द की वासना को 'दूर हट' कह देते हैं और तब भी इस मुख्य ब्रह्मानन्द की भावना को बड़ी तत्परता से किया करते हैं । परपुरुष के व्यसन वाली नारी की तरह बाह्य व्यापार करता हुआ भी धीर पुरुष, जब एक बार भी इस तत्व में विश्राम पा लेता है, तब सदा इसी आनन्द को चखता रहता है । 'धीर' हम उसी को कहते हैं कि जब इन्द्रियां विषयों की ओर को जाने को जोर जबरदस्ती करने लगें तब भी जो आत्मानन्द के आस्वाद की इच्छा