पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 688, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० पञ्चदशी
से उन सब को डाट बता कर उसी की चिन्ता में लगा रहे। बोझा उठाने वाला पुरुष जब सिर के बोझ को उतार कर फेंक देता है, उस समय उसे जैसा विश्राम मिलता है, संसार की खट- पट के छूट जाने से जब वैसी बुद्धि किसी की हो जाय, तब उसे ही हम 'विश्राम पाना' कहते हैं। इस तत्व में विश्राम पा लेने वाले पुरुष की ऐसी अवस्था हो जाती है कि वह उदासीनकाल में जैसे आनन्दतत्पर रहता है, ठीक उसी तरह सुख दुःख के कारणों या सुख दुःखों के प्राप्त होने पर भी उसी लगन से आत्मानन्द का स्वाद लेता रहता है। वह शरीर को सुख दुःख भोगने देता है और मन से ब्रह्मानन्द को चखता रहता है। संसार के जो कोई विषय ब्रह्मानन्द का अनुसन्धान नहीं करने देते, उनकी ओर से तो वह इतना लापरवाह हो जाता है जैसे कोई सती होने वाली स्त्री शृङ्गार की ओर से लापरवाह हो गई हो। ॅ धीर पुरुष की बुद्धि तो कन्वे की आंख की तरह कभी आत्मानन्द को भोगती और कभी आत्मानन्द का विरोध न करने वाले संसारी सुखों का अनुभव किया करती है। कव्वे की एक ही पुतली होती है, वही कभी दाहिनी आंख में और कभी बांयी आंख में आया जाया करती है, इसी प्रकार तत्वज्ञानी की मति दोनों आनन्दों में चक्कर लगाती रहती है। 'विषयानन्द' और 'ब्रह्मानन्द' दोनों आनन्दों को भोगने वाला तत्वज्ञानी तो दुभाषिये की तरह का होता है। दुभाषिया जैसे दोनों की बात समझ लेता है ऐसे ही तत्वज्ञानी 'लौकिक' और 'वैदिक' दोनों आनन्दों को लूटा करता है। जो पुरुष आधा गंगाजल में डूब रहा हो और आधा धूप में खड़ा हो वह जैसे सर्दी गर्मी दोनों को एक साथ अनुभव किया करता है इसी प्रकार दुखों से उसे उद्वेग नहीं होता क्योंकि उसी