भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( १४९ ) अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति । जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे विनश्यति ॥ ३५२ ॥ अरक्षित पुरुष दैवसे रक्षित हुआ स्थित रहताहै दैवसे हत होनेसे सुर- क्षितभी नष्ट होता है । वनमें त्यागन किया अनाथभी जीताहै और यत्नकरने पर घरमें भी नहीं जीता है ॥ ३५२ ॥ तदहं न यास्यामि भवद्भ्यां च यत्प्रतिभाति तत्कर्त्तव्यम्" । अथ तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा अनागतविधाता प्रत्युत्पन्नमतिश्च निष्क्रान्तौ सह परिजनेन । अथ प्रभाते तैर्मत्स्यजीविभि- र्जलैस्तज्जलाशयमालोढ्य यद्भविष्येण सह तत् सरो निर्म- त्स्यतां नीतम् । अतोऽहं ब्रवीमि "अनागतविधाता च" इति तत् ज्ञात्वा टिट्टिभ आह-"भद्रे ? किं मां यद्भविष्यसदृशं सम्भावयसि ? तत्पश्य मे बुद्धिप्रभावं यावदेनं दुष्टसमुद्रं स्वचञ्च्वा शोषयामि" । टिट्टिभी आह- "अहो ! कस्ते समुद्रेण सह विग्रहः ? तन्न युक्तमस्योपरि कोपं कर्तुम् । उक्तञ्च- सो मैं तो और स्थानमें न जाऊंगा जो आपको अच्छा लगे सो करो" । तब उसके इस निश्चयको जानकर अनागतविधाता और प्रत्युत्पन्नमति परि- जन (कुटुम्ब) सहित वहांसे चलेगये । प्रातःकाल धीमरोंने जालसे उस सरो- वरको आलोड़ित कर यद्भविष्यके संग वह सरोवर मत्स्यरहित करदिया । इससे मैं कहता हूं "अनागतविधाता प्रत्युत्पन्नमति"। यह सुन टिट्टिभ बोला, - "भद्रे! क्या तू मुझे यद्भविष्यकी समान जानती है ? सो मेरी बुद्धिके प्रभावको देख कि, इस दुष्ट समुद्रको अपनी चोंचसे शोखे डालता हूं" । टिट्टिभी बोली,- "अहो ! समुद्रसे तुम्हारी कैसी लड़ाई ? सो इसके ऊपर क्रोध करना उचित नहीं । कहाहै- पुंसामसमर्थानामुपद्रवायात्मनो भवेत्कोपः । पिठरं ज्वलदतिमात्रं निजपार्श्वानिव दह्तितराम् ॥३५३॥

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